शख्सियत

जन्मदिन विशेष: प्रेम चोपड़ा को फिल्मों में ब्रेक पाने की ट्रिक सागर के उमा दादा ने बताई थी

जब सागर और मकरोनिया की सड़कों पर साइकिल से भटकते थे दिग्गज अभिनेता प्रेम चोपड़ा

सागर। अपनी अनोखी डायलॉग डिलीवरी और उम्दा अदाकारी से भारतीय सिनेमा में खलनायकी के नए आयाम स्थापित करने वाले दिग्गज अभिनेता प्रेम चोपड़ा का आज जन्म दिन है। वे 23 सितंबर 1935 को अविभाजित भारत के लाहौर शहर में जन्मे थे और वे अपनी जीवन यात्रा के 90 वर्ष पूरे कर चुके हैं। हिंदी सिनेमा के इस चर्चित सितारे का मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर सागर से एक गहरा और दिलचस्प नाता रहा है। आज भले ही दुनिया उन्हें फ़िल्मी पर्दे के एक खूंखार विलेन के रूप में जानती है, लेकिन 1950 के दशक के अंतिम वर्षों में वे सागर की सड़कों पर एक साधारण नौकरीपेशा युवक की तरह साइकिल से घूमा करते थे और लोगों के घरों की कुंडियां खटखटाया करते थे। दरअसल, उस दौर में प्रेम चोपड़ा फ़िल्मी दुनिया में पांव जमाने के ख्वाब देख रहे थे और पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाने के लिए उन्होंने बेनेट एंड कोलमैन कंपनी द्वारा संचालित प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में मध्य प्रदेश, बिहार और उड़ीसा क्षेत्र के सेल्स एंड सर्कुलेशन सुपरवाइजर के तौर पर नौकरी की थी। इसी सिलसिले में वे पहली बार 1957-58 के आसपास सागर पहुंचे थे। सिविल लाइंस निवासी 94 वर्षीय दादा उमा यादव, सागर में उनकी इत्तेफाकन मुलाकात हुई और चोपड़ा ने दी टाइम्स ऑफ इंडिया की सर्कुलेशन एजेन्सी दे दी। ​उस जमाने में सागर में अंग्रेजी पढ़ने-समझने वाले लोग बेहद सीमित थे, जिसके कारण अखबार की बिक्री बहुत कम होती थी। बिक्री बढ़ाने और नए पाठक तैयार करने के लिए कंपनी ने प्रेम चोपड़ा को सागर भेजा था।

 

उमा दादा और प्रेम चोपड़ा दोनों एक-एक साइकिल पर सवार होकर सैन्य क्षेत्र (कैंट) से लेकर सागर विश्वविद्यालय की मकरोनिया स्थित ओल्ड साइट तक जाते थे और वहां के सैन्य अधिकारियों तथा प्राध्यापकों को टाइम्स पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। जिस दिन दो-चार नए ग्राहक बन जाते, दोनों मित्र खुशी-खुशी ‘मनोहर टॉकीज’ में फिल्म देखने चले जाते थे। प्रेम चोपड़ा के इस संघर्षपूर्ण दौर का उल्लेख उनकी पुत्री रकिता नंदा द्वारा लिखित अधिकृत जीवनी ‘प्रेम नाम है मेरा: प्रेम चोपड़ा’ (2014) में भी विस्तार से किया गया है। सागर प्रवास के दौरान ही प्रेम चोपड़ा ने उमा दादा से फिल्मों में काम करने की अपनी गहरी इच्छा साझा की थी। सही मौका न मिलने पर उमा दादा ने ही उन्हें सलाह दी थी कि वे बंबई (अब मुंबई) स्थित अखबार के संपादकीय कार्यालय में समय बिताएं, क्योंकि वहां अक्सर बड़े-बड़े फिल्म निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्मों के प्रचार, विज्ञापन और साक्षात्कार के सिलसिले में आते रहते हैं। प्रेम चोपड़ा ने इस सलाह को गंभीरता से लिया और मुंबई ऑफिस में निर्देशकों के आने पर तस्वीरें दिखाकर मौके तलाशने लगे। 1960 के दशक की शुरुआत में उन्हें फिल्में मिलनी शुरू हो गईं, लेकिन जब तक 1967 में सुपर-हिट फिल्म ‘उपकार’ रिलीज नहीं हो गई, तब तक उन्होंने अपनी सर्कुलेशन सुपरवाइजर की सुरक्षित नौकरी नहीं छोड़ी। मुंबई में काम की तलाश में स्टूडियो-दर-स्टूडियो और प्रोड्यूसर्स-डायरेक्टर्स के चक्कर काटने के दौरान भी प्रेम चोपड़ा सागर में अपने मित्र उमा यादव से निरंतर संपर्क बनाए हुए थे। उन्हें जब भी वक्त मिलता, वे उमा दादा को पोस्टकार्ड लिखकर भेजते रहते थे। यह सिलसिला करीब एक दशक तक चला। इन पत्रों में वे अपने संघर्ष, खान-पान, लोगों के व्यवहार से लेकर सागर में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के सर्कुलेशन और बिक्री के बारे में पूछताछ करते रहते थे। ​उमा दादा के बड़े सुपुत्र मनोज ने बताया— “मैंने पिताजी की म्यूनिसिपल स्कूल के सामने स्थित बुक स्टॉल के काउंटर की दराज में ये पोस्टकार्ड कई बार देखे थे। उस समय मैं किशोरावस्था में था, इसलिए इन पत्रों का ऐतिहासिक महत्व नहीं समझ पाया और एक दिन दराज खाली करने के दौरान ये पत्र फेंक दिए। आज बहुत अफसोस होता है कि अगर चोपड़ा जी के हस्तलिखित पत्र हमारे पास होते, तो पिताजी (उमा दादा) उन्हें पढ़कर कितना खुश होते।”​वहीं, उमा दादा के अनुज पुत्र अनिल यादव व पुत्री मंजू यादव ने बताया कि जैसे ही पिताजी का स्वास्थ्य अनुकूल होगा, वे प्रेम चोपड़ा जी से संपर्क करने का प्रयास करेंगे। उम्मीद है कि करीब 60-65 वर्षों बाद अपने पुराने मित्र से जुड़ी स्मृतियों को साझा कर प्रेम चोपड़ा जी भी बेहद प्रसन्न होंगे।23/09/2026….9425172417

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