सागर में बारूद के ढेर पर पूरा मोहल्ला! घनी आबादी में बेधड़क खुली पटाखा दुकान

सागर। शहर के खुरई रोड स्थित संत कंवरराम वार्ड (सिंधी कैम्प) में शासकीय आईटीआई के सामने संचालित एक पटाखा दुकान किसी बड़े हादसे को खुला न्योता दे रही है। रिहायशी इलाके में स्थित इस दुकान में करीब पंद्रह सौ किलोग्राम बारूद के भंडारण की क्षमता है। हैरानी की बात यह है कि स्थानीय थाना प्रभारी, पटवारी, पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन के तमाम जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर खतरे से पूरी तरह वाकिफ हैं, लेकिन कागजी प्रावधानों की आड़ लेकर कार्रवाई से आंखें मूंदे बैठे हैं। इस पूरे घटनाक्रम और व्यवस्था की पोल खोलती दो तस्वीरें प्रशासनिक दावों का असली सच उजागर करती हैं। इनमें से एक तस्वीर में यह दुकान चंद दिन पहले पूरी तरह खाली और वीरान नजर आ रही है। यह तब का मंजर है, जब तत्कालीन कलेक्टर प्रतिभा पाल और एसपी अनुराग सुजानिया ने मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए इसे तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिया था। वहीं दूसरी तस्वीर गत गुरुवार शाम की है, जिसमें यही दुकान पूरी धकापेल के साथ बेखौफ चलती दिखाई दे रही है।
विडंबना यह है कि उसी दिन दोपहर को इस दुकान का संचालक नवागत कलेक्टर दिलीप कुमार यादव द्वारा बुलाई गई आतिशबाजी विक्रेताओं की समीक्षा बैठक में शामिल हुआ था। कलेक्टर यादव ने बैठक में बेहद साफ लफ्जों में ताकीद की थी कि आबादी के आसपास किसी भी हाल में पटाखे नहीं बेचे जाएंगे। लेकिन इस दुकान संचालक ने कलेक्टर के निर्देशों को कितनी संजीदगी से लिया, यह बताने के लिए दोनों तस्वीरें ही काफी हैं। जो सरासर प्रशासनिक इकबाल पर धूल उड़ातीं दिख रही हैं।
यक्ष प्रश्न यह है कि जो दुकान महज 10 दिन पहले नियमों की अवहेलना का हवाला देकर खाली करा ली गई थी, उसे आखिर अब किन रातों-रात बदले नियमों या किस “ऊपरी मेहरबानी” के तहत दोबारा कारोबार करने की खुली छूट दे दी गई? प्रशासनिक गलियारों में यह पुराना तर्क उछाला जाता है कि दुकान का लाइसेंस राज्य शासन स्तर से जारी हुआ है, इसलिए जिला प्रशासन के पास सीधे कार्रवाई का अधिकार नहीं है—मानो किसी भीषण अग्निकांड के बाद ही तंत्र की नींद खुलेगी। सुरक्षा दावों की पोल इस बात से खुलती है कि इस विस्फोटक डिपो में तय मानकों के मुताबिक कोई प्रभावी फायर फाइटिंग सिस्टम तक मौजूद नहीं है। बीते वर्षों में हरदा और अन्य जिलों में हुए भीषण हादसों के जख्म आज भी ताजा हैं, फिर भी जिम्मेदारों की सुस्ती खत्म नहीं हो रही।
मालवा क्षेत्र के एक हादसे के बाद संचालक ने महज औपचारिकता निभाते हुए छत पर प्लास्टिक की टंकी रखवाकर पाइपलाइन जुड़वा ली, जो नगर निगम के सुरक्षा मानकों से कोसों दूर है। इस पूरे खेल में जिला प्रशासन की शस्त्र शाखा और पुलिस-प्रशासन का वर्षों से जमा अमला पूरी तरह कटघरे में खड़ा है। हालांकि नवागत कलेक्टर दिलीप कुमार यादव ने हाल ही में कार्यभार संभाला है और वे वस्तुस्थिति को समझकर कदम उठाने का दावा कर रहे हैं।
व्यवस्था की विडंबना और बंदरबांट का सबसे बड़ा प्रमाण इसका दूसरा पहलू है। इसी दुकान से महज दो किलोमीटर की दूरी पर बनवारी लाल गुप्ता के नाम से एक अन्य लाइसेंसी दुकान है, जिसे फुटकर पटाखे बेचने के लिए अधिकृत किया गया था। यह दुकान आबादी से सुरक्षित दूरी पर है और नगर निगम की गाइडलाइन के अनुसार पुख्ता फायर फाइटिंग सिस्टम से भी लैस है। इसके बावजूद इस वर्ष प्रशासनिक मेहरबानी के चलते इस वैध और सुरक्षित दुकान का लाइसेंस रिन्यू ही नहीं किया गया। इस मनमानी के पीछे 50 लाख से लेकर एक-दो करोड़ रुपये तक के अवैध कारोबारी हितों और प्रतिस्पर्धा का खेल बताया जा रहा है, जहां प्रशासनिक कलम को “लक्ष्मी नारायण जी” से वश में कराकर तय होता है कि नियमों को कैसे ताक पर रखा जाए। किसका कारोबार चमकाया जाए। किसे कायदे-कानूनों में उलझाकर दर- दर भटकने मजबूर किया जाए। जब तक सुरक्षा और नियमों की अनदेखी करने वाले इस तंत्र पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक इस क्षेत्र जनता बारूद के ढेर पर जीने को मजबूर रहेगी।
सागरवाणी…9425172417



