
विवि के अकादमिक गलियारों में चर्चाएं गरम, प्रभारी कुलपतिमें चर्चाएं गरम, प्रभारी कुलपति चहेते अभ्यर्थियों को उपकृत करने उड़ा रहे नियमों की धज्जियां, अभ्यर्थियों में प्रभारी कुलपति के बेटे के नाम की चर्चा !
सागर। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. वायएस ठाकुर समेत कतिपय प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर की कार्य प्रणाली पर सवा सवाल उठ रहे हैं। मामला एमबीए और लॉ विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रिक्त पदों पर संविदा भर्ती का है। चर्चा है कि प्रभारी कुलपति प्रो. वाय.एस. ठाकुर ने अपने बेटे और चहेतों को उपकृत करने के लिए विश्वविद्यालय के नियमों, यूजीसी रेगुलेशन 2018 और एआईसीटीई मानकों की जमकर धज्जियां उड़ाई हैं। जिससे सोमवार को होने वाले इंटरव्यू से पहले ही पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
बेटे के लिए ‘स्पेशल’ स्क्रीनिंग, 6 पद पर सिर्फ 6 ही पात्र
विश्वविद्यालय के गलियारों में चर्चा है कि प्रभारी कुलपति के पुत्र स्वयं एमबीए विभाग में आवेदक हैं। आरोप है कि अपने बेटे का चयन सुनिश्चित करने के लिए स्क्रीनिंग कमेटी के माध्यम से खेल किया गया। जहां विश्वविद्यालय का नियम एक सीट पर 30 अभ्यर्थियों को बुलाने का है, वहीं एमबीए की 6 सीटों के लिए केवल 6 लोगों को ही क्वालिफाइड दिखाया गया है। इनमें से एक कुलपति के सुपुत्र हैं। आश्चर्यजनक रूप से, लॉ विभाग में 3 पदों के लिए 50 अभ्यर्थियों को बुलाया गया है, जबकि एमबीए में पदों के बराबर ही अभ्यर्थी बुलाकर प्रतिस्पर्धा को शून्य कर दिया गया है।
वैधानिक डीन को प्रक्रिया से किया बाहर
संलग्न दस्तावेजों के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया में सबसे बड़ी ‘प्रक्रियात्मक अनियमितता’ कॉमर्स एंड बिजनेस मैनेजमेंट के वैधानिक डीन प्रो. श्री भागवत को बाहर रखना है। यूजीसी रेगुलेशन 2018 के क्लॉज 5.1 के तहत चयन समिति में संबंधित स्कूल के डीन का होना अनिवार्य है। आरोप है कि डीन को जानबूझकर हटाया गया और उनकी जगह अपने विश्वासपात्रों को कमेटी में शामिल किया गया। शिकायतकर्ता का तर्क है कि जिस प्रक्रिया में कुलपति का स्वयं का पुत्र उम्मीदवार हो, वहां कुलपति को नैतिक और कानूनी रूप से पूरी प्रक्रिया से खुद को अलग कर लेना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ही कमेटी का गठन किया।
भर्ती प्रक्रिया में धांधली के गंभीर आरोप
नेट-पीएचडी धारकों और विश्वविद्यालय के अनुभवी शिक्षकों को स्क्रीनिंग में बाहर कर दिया गया, जबकि निजी कॉलेज के शिक्षकों को पात्र घोषित किया गया। विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसरों को दरकिनार कर जूनियर शिक्षकों को हेड का चार्ज दिया गया ताकि चयन प्रक्रिया पर नियंत्रण रखा जा सके। ओबीसी वर्ग में भी केवल एक ही अभ्यर्थी को बुलाया गया है, जिससे उसका चयन महज एक औपचारिकता रह गया है।
विवादों में ‘इन-चार्ज’ की कार्यप्रणाली
विवि में चर्चा है कि प्रभारी कुलपति ने केवल उन विभागों (एमबीए व लॉ) में नियुक्तियां निकाली हैं जहां उनके व्यक्तिगत हित जुड़े हैं, जबकि विश्वविद्यालय के अन्य 40 विभागों की सुध नहीं ली गई। जानकारों का कहना है कि नियमों के विरुद्ध गठित की गई स्क्रीनिंग कमेटी और वैधानिक डीन की अनुपस्थिति इस पूरी चयन प्रक्रिया को ‘शून्य’ घोषित करने के लिए पर्याप्त आधार है। प्रभावित अभ्यर्थी शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली एवं मप्र हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
– सागरवाणी /22/03/2026



