चौपाल/चौराहा

नारदवाणी: अफसराइन की नानी की विदाई और टेंडर का ‘सिस्टम’

      नारदवाणी

1. अफसराइन की नानी की विदाई और टेंडर का ‘सिस्टम’

​दर्द-ए-दिल की दवा बेचने का लाइसेंस देने वाले विभाग की अफसराइन की कार्यशैली गजब है। हाल ही में उनकी नानी का इंतकाल हुआ, जिसके प्रति सहानुभूति तो है, लेकिन उनकी प्रशासनिक चतुराई की चर्चा उससे कहीं ज्यादा है। मैडम का रिकॉर्ड रहा है कि वे टेंडर की जटिल प्रक्रियाओं, बैंक गारंटी की जांच और तकनीकी कागजी कार्रवाई से खुद को कोसों दूर रखती हैं। शायद वे इसे ‘रिस्की’ काम मानती हैं। उनकी इस “आदत” को कायम रखने में इस दफा उनकी नानी की डेथ ने मदद कर दी। यानी मैडम टेंडरिंग के पीक टाइम में छुट्टी लेकर घर बैठ गई। ​अफसराइन के बारे में बताया जाता है जैसे ही कारोबारियों के साथ टेंडर की सारी ‘पिरकिरिया’ (प्रक्रिया) पूरी होकर ठेका फाइनल हो जाता है, मैडम अचानक सक्रिय हो जाती हैं। जोखिम खत्म और मैनेजमेंट शुरु होते ही वे सिस्टम की बराबर की हिस्सेदार बन जाती हैं। विभाग के लोग कह रहे हैं कि जिम्मेदारी के वक्त ‘नानी याद आती है’ और फायदे के वक्त ‘मैडम हाजिर हो जाती हैं’।

2. प्राचार्य का ‘वीडियो-वार’, शीशे के घर में रहकर पत्थरबाजी!

​एक जिला मुख्यालय के सरकारी कॉलेज की प्राचार्य अपनी ही कार्यशैली के कारण विवादों में हैं। हाल ही में जब जिले की प्रशासनिक मुखिया ने उन्हें मीटिंग से गायब रहने पर ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया, तो मैडम ने बदला लेने का अनोखा तरीका निकाला। वे अपने करीबियों और सहकर्मियों को प्रशासनिक मुखिया का एक पुराना हाईकोर्ट वाला वीडियो भेज रही हैं, जिसमें जज साहब उनकी कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी कर रहे हैं। लेकिन यह दांव उन पर उल्टा पड़ता दिख रहा है। लोग अब प्राचार्य के अपने पुराने कारनामों की चर्चा कर रहे हैं—जैसे कि उन्होंने गलत जानकारी देकर पद पाया, कॉलेज की करोड़ों की एफडी (FD) सरकारी बैंक से निकालकर प्राइवेट बैंक में क्यों डाली (जिसके पीछे के ‘कमीशन’ वाले ‘लाभ’ जगजाहिर हैं), और कैसे उन्होंने नियम विरुद्ध नियुक्तियां कीं। साथ ही, जनभागीदारी फंड से होटल के हजारों के बिल भरने के मामले भी उछल रहे हैं। चर्चा है कि यह वीडियो स्टंट जल्द ही प्राचार्य महोदया पर भारी पड़ने वाला है।

3. ‘पुत्र-मोह’ वाले टेम्परेरी मुखियाऔर क्लबों दौलत 

अपने बेटे को टेम्परेरी माट्साब बनाकर चर्चा में आए ​उच्च शिक्षा के सर्वोच्च संस्थान के ‘अस्थायी प्रमुख’ का एक और नया कारनामा सामने आया है। बताया जाता उनके मूल विभाग( धंधा प्रबंधन) में दो क्लब हैं, जो छात्रों के आपसी चंदे से चलते हैं ताकि वे टूर पर जा सकें या विद्वानों के लेक्चर सुन सकें। लेकिन आरोप है कि ‘प्रमुख’ साहब ने इस चंदे की राशि को अनाप-शनाप तरीके से अन्य संदिग्ध कामों में उड़ा दिया। ​जब ये बात विभाग के ही एक पुराने एचओडी (जिनसे प्रमुख की पुरानी निजी रंजिश ‘असली-नकली बीवी’ वाले मामले को लेकर जगजाहिर है) को मिली तो उन्होंने खर्चा की फाइलें खोजना शुरू कर दी। टेम्परेरी साहेब को ये पता चला तो वे घबरा गए। खुद को बचाने के लिए उन्होंने सबसे पहले उस ‘राजदार बाबू’ का तबादला कर दिया, जिसके पास सारा हिसाब-किताब था। फिलहाल ये सारा लेखा-जोखा साहेब की सीधी निगरानी में है, ताकि दुश्मन के हाथ सबूत लगने से रोका जा सके।

4. महिला आरक्षण: नेताओं का करोड़ों का ‘झुनझुना’

​महिला आरक्षण बिल-2023 के पारित होने के बाद कई बड़े और मंझोले नेताओं ने अपनी पत्नियों को भविष्य की ‘माननीय’ बनाने के लिए तिजोरी खोल दी थी। वार्ड- मुहल्ला में चूड़ी-बिंदी बांटने से लेकर, धार्मिक कथाएं कराने, बड़े-बड़े फ्लेक्स लगवाने और ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्में दिखाने में लाखों रुपए बहा दिए गए। लेकिन जब पता चला कि आरक्षण 2029 से पहले लागू नहीं होगा, तो इन ‘भावी महिला नेताओं’ के हाथ सिर्फ तीन साल तक बजाने वाला ‘झुनझुना’ ही लगा है। हैरानी की बात यह है कि पत्नियों की राजनीति चमकने की उम्मीद टूटने से उनके पति (पुरुष नेता) मन ही मन खुश हैं। उन्हें डर था कि आरक्षण आने पर उनकी अपनी सीट हाथ से चली जाएगी। अब 2028 के विधानसभा चुनाव में वे खुद अपनी दावेदारी सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और ‘सब अच्छा होगा’ की तर्ज पर राहत की सांस ले रहे हैं।

5. हुक्मरानों की ‘धूप’ और हेलमेट की ‘फ्लॉप’ कहानी

​प्रदेश भर में प्रशासन ने जोर-शोर से 10 दिवसीय हेलमेट चेकिंग अभियान शुरू किया है। लेकिन इस अभियान की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इसे लागू करने से पहले ज़मीनी हकीकत और मौसम का मिजाज नहीं देखा गया। आला अफसरों ने बंद कमरों में बैठकर 24 घंटे के भीतर आदेश तो थमा दिया, लेकिन प्रचंड गर्मी ने पूरे खेल को बिगाड़ दिया। हालात यह हैं कि दोपहर की तपती धूप में सड़कें ‘लॉकडाउन’ जैसी वीरान हो रही हैं। जब लोग बाहर ही नहीं निकल रहे, तो पुलिस चालान किसका काटे? अब विभाग के मंझोले स्तर के अधिकारी दबी जुबान में कह रहे हैं कि यदि खाकी वर्दी वाले अभियान चलाने से पहले मौसम विभाग से थोड़ा मशविरा कर लेते, तो शायद यह ‘फ्लॉप शो’ होने से बच जाता। सरकारी टारगेट और मौसम की मार के बीच सिपाही भी पसीने-पसीने हो रहे हैं।

29 अप्रैल 2026…9425172417

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