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जमीनी नेत्री की लेक व्यू वाली कोठी पर है नजर

     नारदवाणी

1. लेक-व्यू कोठी का तिलस्म: ‘जमीनी’ नेत्री अब ‘जमीन’ वाली बनने की चाह!

जिन्हें आवाम ने जमीनी नेत्री मानकर दिल्ली की सियासत के लिए मुकर्रर किया था, उनके कदम अब जमीन से उखड़कर ‘जायदाद’ की तरफ मुड़ गए हैं। चर्चा है कि मैडम की नजर अब शहर की उस ऐतिहासिक और आलीशान इमारत पर है, जिसका रुख झील (लेक व्यू) की तरफ खुलता है। इस ‘मिशन’ को अंजाम देने के लिए महाराष्ट्र बॉर्डर स्थित मायके से खास ‘रिश्तेदारों’ की फौज तैनात की गई है। इमारत के मालिक बंगाली बुजुर्ग हैं, जो उम्र के आखिरी पड़ाव पर हैं। सौदा करोड़ों का है, लेकिन सवाल वही है कि आखिर इस भारी-भरकम रकम का ‘ज़रिया’ क्या है? लगता है दिल्ली की राजनीति तो सिर्फ बहाना है, असली मकसद तो सागर की बेशकीमती जमीनों पर अपनी सल्तनत कायम करना है।

2. कांग्रेसी बेरुखी: न बंगाल का गम, न खुशी-ए-केरलम!

सागर के कांग्रेसियों का मिजाज इन दिनों समझ से परे है। पश्चिम बंगाल में ममता दीदी (जो मैडम की गुरु-बहन मानी जाती हैं) की करारी हार और टीएमसी की छटपटाहट पर यहाँ सन्नाटा पसरा रहा। न तो भाजपा के खिलाफ कोई मोर्चा खुला, न ही चुनाव आयोग पर तोहमतें मढ़ी गईं। चलो, बंगाल तो दूर है, लेकिन केरल में तो कांग्रेस की लाज बच गई! ताज्जुब की बात यह है कि सागर के ‘सूरमाओं’ ने इस जीत का जश्न मनाना भी मुनासिब नहीं समझा। अब इसे बजट की किल्लत कहें या कार्यकर्ताओं की बेरुखी, पर शहर के ‘चर्चावीरों’ का कहना है कि पार्टी अब सिर्फ कागजों और वॉट्सऐप ग्रुपों तक सिमट कर रह गई है।

​3. वन-टू का फोर: ‘छोटा रिचार्ज’ और आंकड़ों की बाजीगरी

​नगर निगम में ‘स्वच्छता सर्वे-2026’ की तैयारियां जंग के स्तर पर हैं। दीवारों पर रंगों की लीपापोती और डिजाइन का जिम्मा निगम के चहेते ‘छोटा रिचार्ज’ को सौंपा गया है। ठेकेदारी की दुनिया में ‘शॉर्टकट’ के उस्ताद माने जाने वाले ये भाई साहब हर मर्ज की दवा जानते हैं। गलियारों में कानाफूसी है कि जहाँ काम कम और नंबर ज्यादा चाहिए हों, वहाँ रिचार्ज भाई 25 में से 5 का अंक उड़ाकर उसे 6 बना देते हैं। बिना किसी ठोस सुबूत के यह बाजीगरी इतनी सफाई से होती है कि साहबान भी खुश और ठेकेदार की जेब भी गरम। आखिर ‘वन-टू का फोर’ करना हर किसी के बस की बात थोड़े ही है!

​4. वज़ीर की ‘भोज-नीति’: पालक पनीर से तौबा!

​जिले के पालक मंत्री जी इस बार बड़े ‘सात्विक’ और चौकन्ने मोड में नजर आए। आमतौर पर मंत्रियों के दौरे पर रसूखदारों के यहाँ लजीज दावतों का दौर चलता है, लेकिन इस बार मंत्री जी ने किसी भी विधायक या नेता के घर ‘पालक पनीर’ खाने से साफ़ इंकार कर दिया। उन्होंने सर्किट हाउस में ही सादगी से भोजन करना पसंद किया। अंदर की खबर यह है कि मंत्री जी नई कलेक्टर साहिबा को कोई गलत संकेत नहीं देना चाहते थे। कलेक्टर साहिबा चूंकि मंत्री जी के गृह जिले रीवा से ही आई हैं, इसलिए मंत्री जी चाहते थे कि वे किसी ‘भ्रम’ का शिकार न हों कि कौन खास है और किसकी कितनी ‘सेटिंग’ है।

5. ‘बीड़ी क्वीन’ का पद्म-मोह: बनावटी शालीनता और जुगाड़ का ‘वार रूम’

​सिविल लाइंस से लेकर भोपाल के गलियारों तक इन दिनों ‘पद्म’ की गूँज है। अवार्ड हथियाने की स्ट्रैटेजी इस बार बदल दी गई है; सागर के बजाय अब भोपाल में नया ‘वार रूम’ तैयार किया गया है ताकि जासूसी न हो सके। पुरानी फाइलों को नए कवर में लपेटकर लाबिस्टों की फौज (जिनमें पुराने वामपंथी और कांग्रेसी शामिल हैं) सक्रिय कर दी गई है। खुद को ‘कनवर्टेड भाजपाई’ दिखाने का नाटक भी जोरों पर है। साथ में उनकी ‘इम्पोर्टेड शहजादी’ भी हैं, जो कभी ‘किंग ऑफ गुड टाइम्स’ विजय माल्या की सोहबत में ‘महिला सशक्तिकरण’ का पाठ पढ़कर आई थीं। अफसोस कि जिस अर्दली के बेटे ने अपनी मेहनत से पद्मश्री जीता, ये ‘सेठानी’ उसके अंतिम समय में अस्पताल तक हाल पूछने नहीं गईं। यहाँ तक कि उन योग गुरु को भी भुला दिया गया जिन्होंने इन्हें सेहत बख्शी थी। बीड़ी के धुएं से इकट्ठा की गई दौलत और किराए के बंदूकधारियों का दिखावा शायद ‘अहंकार’ तो तृप्त कर सकता है, पर ‘सम्मान’ नहीं दिला सकता। इस ‘छद्मश्री’ की हकीकत से शहर वाकिफ है, भले ही भोपाल में दरबार सजा लिया जाए।

नारदवाणी……9425172417…..10/05/2026

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