आर्मी में ठेके पर दाढ़ी- कटिंग को लेबर कोर्ट ने गलत ठहराया
प्रभावित नाईयों को नियमित भर्ती में प्राथमिकता समेत मुआवजा का आदेश... कोर्ट ने साफ कर किया कि 'ठेका' केवल जिम्मेदारी से बचने की ढाल नहीं हो सकता।

सागर के सैन्य संस्थान में वर्षों तक ठेके पर नाई रखे, सीजीआईटी ने ‘अनुचित श्रम व्यवहार’ माना
सागर। केंद्रीय शासन औद्योगिक न्यायाधिकरण ( सीजीआईटी), जबलपुर ने श्रमिकों के हित में एक दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई कार्य स्थायी और निरंतर प्रकृति का है, तो उसे वर्षों तक ठेका श्रमिकों के माध्यम से कराना ‘अनुचित श्रम व्यवहार’ की श्रेणी में आता है। न्यायाधिकरण ने सागर स्थित सैन्य संस्थान, महार रेजीमेंटल सेंटर को आदेश दिया है कि वे वर्षों से कार्यरत नाइयों को भर्ती प्रक्रिया में आयु और योग्यता में छूट देकर नियमित करें और सेवानिवृत्त हो चुके कामगारों को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करें।
क्या था मामला?
यह विवाद साल 2016 से लंबित था, जिसमें अनिल सेन, जितेन्द्र सेन और अन्य 7 कामगारों ने महार रेजीमेंटल सेंटर के विरुद्ध मोर्चा खोला था। इन कामगारों का कहना था कि वे पिछले 5 से 30 वर्षों से संस्थान में नाई के रूप में सेवा दे रहे हैं। उन्हें ब्रिगेडियर कार्यालय द्वारा गेट पास जारी किए जाते थे, लेकिन प्रबंधन ने उन्हें नियमित करने के बजाय समाचार पत्र में विज्ञापन निकालकर नई भर्ती शुरू कर दी और पुराने अनुभवी कामगारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। मामले में प्रभावित नाई कामगारों की तरफ से एड. पवन नन्होरिया, एड. सुयश ठाकुर और एड. धनंजय श्रीवास्तव ने पैरवी की
एमआरसी ने कहा, हम नियोक्ता नहीं
सुनवाई के दौरान महार रेजीमेंटल सेंटर के प्रबंधन ने तर्क दिया कि ये कामगार उनके प्रत्यक्ष कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि एम.एस तलवार एंड कंपनी जैसी निजी एजेंसियों के माध्यम से संविदा पर रखे गए थे। प्रबंधन ने कहा कि वे केवल निविदा के आधार पर सेवाएं लेते थे और भुगतान ठेकेदार को किया जाता था, इसलिए इन कामगारों का नियमितीकरण का कोई दावा नहीं बनता।
भले रक्षा संस्थान लेकिन नाइयों का विवाद औद्योगिक
प्रेसाइडिंग ऑफिसर पी.के. श्रीवास्तव ने इस मामले में गहन कानूनी विवेचना की। कोर्ट ने माना कि भले ही रक्षा संस्थान होने के नाते कुछ गतिविधियां अलग हो सकती हैं, लेकिन नाई का कार्य औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत ‘उद्योग’ की परिभाषा में आता है।न्यायालय ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर पेश करते हुए कहा कि “जब संस्थान में नाइयों के पद रिक्त थे और कार्य की प्रकृति स्थायी थी, तब भी वर्षों तक ठेका प्रणाली के माध्यम से काम लेना औद्योगिक विवाद अधिनियम की अनुसूची -V का स्पष्ट उल्लंघन है। यह श्रमिकों के अधिकारों का हनन और अनुचित श्रम व्यवहार है।”
भर्ती में प्राथमिकता, 5 लाख रु . का मुआवजा दें
न्यायाधिकरण ने संविदा प्रणाली को पूरी तरह ‘छलपूर्ण’ तो नहीं माना, लेकिन प्रबंधन की कार्यशैली को दोषपूर्ण पाया। कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए। पहला ये कि प्रबंधन 6 महीने के भीतर रिक्त 6 नाई पदों पर पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया शुरू करे। इसमें याचिकाकर्ता कामगारों को उनकी लंबी सेवा अवधि के बदले आयु और शैक्षणिक योग्यता में विशेष छूट दी जाए। दूसरा ये कि जो कामगार केस लंबित रहने के दौरान सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं, प्रबंधन उन्हें 5-5 लाख रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करे। इस निर्णय के बाद श्रम कानून के जानकारों व मजदूर नेताओं का कहना है कि यह निर्णय उन हजारों-लाखों आउटसोर्सिंग और ठेका श्रमिकों के लिए एक बड़ी उम्मीद लेकर आया है, जिन्हें विभाग केवल इसलिए नियमित नहीं करते क्योंकि वे ठेकेदार के माध्यम से काम कर रहे हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘ठेका’ केवल जिम्मेदारी से बचने का ढाल नहीं हो सकता।
06/05/2026….mob no.9425172417




