चौपाल/चौराहा

सागर के इमामत-ए-शरिया को नहीं मंजूर ‘यूसीसी’

विधि आयोग को भेजा विरोध पत्र

सागर। देश और प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर छिड़ी तीखी बहस के बीच सागर के मुस्लिम समाज की प्रमुख धार्मिक और सामाजिक संस्था ‘इमामत-ए-शरिया जिला सागर’ ने यूसीसी लागू करने के प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया है। संस्था ने विधि आयोग को एक विस्तृत ज्ञापन भेजकर अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर समान नागरिक संहिता के पक्ष में नहीं हैं।

​’विविधता में एकता’ पर सीधा आघात

​इमामत-ए-शरिया जिला सागर के अध्यक्ष व अमीर-ए-शरियत मुफ्ती अबरार उल हक जामई ने कड़े शब्दों में कहा कि यूसीसी भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान और ‘विविधता में एकता’ के मूल सिद्धांत को गहरी चोट पहुंचाएगा। संस्था का तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कोई महज सामाजिक रस्म-रिवाज नहीं है, बल्कि यह पवित्र कुरान और सुन्नत की तालीम पर आधारित मजहब का एक अभिन्न हिस्सा है। संपत्ति का बंटवारा (मीरास), निकाह और तलाक जैसी व्यवस्थाएं पूरी तरह धार्मिक हैं और यूसीसी के जरिए इसमें किसी भी तरह का कानूनी बदलाव स्वीकार्य नहीं है। ज्ञापन में जोर देकर कहा गया है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 और 29 देश के हर नागरिक को अपनी धार्मिक आजादी और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने का अधिकार देता है। यूसीसी को लागू करना अल्पसंख्यकों को मिले इन बुनियादी मौलिक अधिकारों पर सीधा आघात होगा।

अन्य समुदायों के कानूनों का हवाला

​संस्था का कहना है कि भारत एक बहु-सांस्कृतिक देश है, जहां सिर्फ मुसलमान ही नहीं, बल्कि सिख, पारसी, ईसाई, बौद्ध, लिंगायत और सैकड़ों कबीले अपने-अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक जीवन जीते हैं। सभी पर जबरन एक कानून थोपने से देश का खूबसूरत सामाजिक ढांचा बिखर सकता है। इसके अलावा, पर्सनल लॉ के तहत निकाह को एक ‘पवित्र अनुबंध’ माना गया है, जिसे दोनों पक्ष आपसी सहमति से खत्म भी कर सकते हैं। यूसीसी के तहत इसमें अनिवार्य न्यायिक हस्तक्षेप लाना इस धार्मिक अवधारणा को ही बदल देगा।

​चार शादी, संपत्ति में अधिकार पर चुप्पी

​जब बात पर्सनल लॉ के तहत आने वाले संवेदनशील मुद्दों जैसे बहुविवाह, दहेज और महिलाओं के अधिकारों पर आती है, तो संस्था ने इसके लिए बाहरी कानून के बजाय आंतरिक सुधारों की बात कही है। ज्ञापन के अनुसार, दहेज प्रथा, महिलाओं के प्रति भेदभाव या संपत्ति में उचित हिस्सा न मिलने जैसी सामाजिक बुराइयां किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये समस्याएं सभी समाजों में मौजूद हैं। संस्था का दावा है कि इस्लामी शिक्षाएं महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव का समर्थन नहीं करतीं। इसके समाधान के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीअत उलमा-ए-हिंद जैसी संस्थाओं ने सामाजिक सुधार और पारिवारिक विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए देश भर में स्वतंत्र विभाग और मध्यस्थता केंद्र स्थापित किए हैं, ताकि महिलाओं को त्वरित और सुलभ न्याय मिल सके।

​क्या है यूसीसी का मूल ढांचा?

​समान नागरिक संहिता (UCC) का प्राथमिक उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए धर्म से परे जाकर एक समान पारिवारिक कानून लागू करना है।

  • प्रतिबंध और पंजीकरण: इसके लागू होने से मुस्लिम पर्सनल लॉ में मान्य बहुविवाह पूरी तरह प्रतिबंधित और अवैध हो जाता है। शादी और तलाक का केवल धार्मिक रीति से होना काफी नहीं होता, बल्कि सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य हो जाता है।
  • समान अधिकार और उम्र: पैतृक और अर्जित संपत्ति में बेटों और बेटियों को पूरी तरह से बराबर का कानूनी हिस्सा मिलता है। लड़कियों की शादी की न्यूनतम कानूनी उम्र सभी धर्मों के लिए एक समान (महिला 18 वर्ष, पुरुष 21 वर्ष) तय की गई है। इसके दायरे में लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के लिए भी रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य किया गया है।
  •  अधिका जनसंख्या नियंत्रण का कोई जिक्र नहीं चर्चाओं में रहने वाले ‘जनसंख्या नियंत्रण’ या ‘दो बच्चों के नियम’ जैसे विषय पूरी तरह से एक अलग नीतिगत मुद्दा हैं। वर्तमान में तैयार किए गए यूसीसी के मसौदों में बच्चों की संख्या सीमित करने का कोई भी सीधा प्रावधान शामिल नहीं है; इसका पूरा ध्यान केवल पारिवारिक कानूनों की एकरूपता पर केंद्रित है।

……9425172417

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