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85 साल पुराना रजिस्टर मिला… विवि बनाने से पहले 1939 में डॉ. गौर बने थे सरस्वती वाचनालय ट्रस्ट के आजीवन सदस्य

उस दौर में 25 रुपये का मूल्य आज के लगभग एक लाख रुपये से अधिक (सोने की तत्कालीन दरों के अनुसार) दिए थे दान

सागर। शिक्षा के महादान से डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय की सौगात देने वाले महान शिक्षाविद डॉ. हरीसिंह गौर की दूरदर्शिता और उदारता का एक और प्रेरक प्रमाण सामने आया है। शहर के हृदय स्थल तीन बत्ती पर स्थित ऐतिहासिक ‘श्री सरस्वती पुस्तकालय एवं वाचनालय ट्रस्ट’ के दस्तावेजी रिकॉर्ड्स के डिजिटलाइजेशन के दौरान एक दुर्लभ सदस्यता रजिस्टर प्राप्त हुआ है। इस रजिस्टर से खुलासा हुआ है कि डॉ. गौर वर्ष 1939-40 में 25 रुपये का चंदा देकर इस वाचनालय के 26वें आजीवन सदस्य बने थे।​ हालांकि ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य व पूर्व सांसद लक्ष्मीनारायण यादव तथा सचिव शुकदेव तिवारी लंबे समय से डॉ. गौर के आजीवन सदस्य होने का दावा करते आ रहे थे, लेकिन अब लिखित साक्ष्य मिलने से उनके इस दावे की आधिकारिक पुष्टि हो गई है। वाचनालय प्रबंधन डॉ. गौर के योगदान और इस ऐतिहासिक जुड़ाव को स्मरणीय बनाने के लिए सदस्यता रजिस्टर के इस पन्ने की कलर्ड फोटो फ्रेम करवाकर मुख्य हॉल में प्रदर्शित करने जा रहा है। इसके अलावा ​यह ऐतिहासिक साक्ष्य ये भी सिद्ध करता है कि सागर विश्वविद्यालय की नींव रखने से वर्षों पहले ही डॉ. गौर ने बुंदेलखंड में ज्ञान और शिक्षा की लौ प्रज्वलित करने का संकल्प ले लिया था। गौरतलब है कि उस दौर में 25 रुपये का मूल्य आज के लगभग एक लाख रुपये से अधिक (सोने की तत्कालीन दरों के अनुसार) बैठता है।

डॉ. गौर ​के कंजूस स्वभाव वाला मिथक टूटा

​रजिस्टर में तत्कालीन क्लर्क ने उनका नाम ‘डॉ. हरी सिंह गौर बैरिस्टर’ के रूप में दर्ज किया है। यह दस्तावेज डॉ. गौर के प्रति बने उस भ्रांति और मिथक को भी पूरी तरह खारिज करता है, जिसमें विश्वविद्यालय की स्थापना से पूर्व उन्हें कथित तौर पर कंजूस बताया जाता था। अपनी कर्मस्थली नागपुर और भंडारा से लेकर सागर तक, उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए न केवल स्वयं मुक्त हस्त से दान दिया, बल्कि अन्य दानदाताओं को भी इसके लिए प्रेरित किया।

सागरवाणी….9425172417

 

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