नारदवाणी: चांदीकांड के ‘दाग’ पर सोने की ‘चमक’!
प्योर कांग्रेसी' का करिश्मा और कुढ़ते ' संगी साथी'!

1. बीड़ी साम्राज्य का पतन और विवादित विरासतों से उठता धुआं
सागर के बीड़ी उद्योग के पतन के साथ ही इसके घराने भी ताश के पत्तों की तरह बिखर रहे हैं। कुछ समय पहले एक मशहूर बीड़ी घराने के 88 वर्षीय सरपरस्त के इंतकाल के बाद जायदाद की जंग छिड़ गई है। चर्चा है कि जाली वसीयत के दम पर एक गुट पूरी मलाई सरूटने के चक्कर में है। इधर कतिपय वारिस इस खब्वा- खवाई को कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। जमीनों के एक बड़े तिजारती का कहना है कि जब तक इन विरासतों का हक्क संबंधी धुआं छट नहीं जाता। तब तक इनमें हाथ डालना बेवकूफी है। फिर भी मन नहीं माने तो जिला न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट जबलपुर के खांटी वकीलों के नाम- नंबर पहले से पाकिट में रखें। जरूरत तो सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के नंबर तक की रहेगी। तिजारती के मुताबिक इसकी वजह कागजी हेरफेर और ‘ब्लैक-व्हाइट’ का खेल करने वाले वे खुदगर्ज वारिस हैं, जो संदिग्ध कागजात के सहारे प्रॉपर्टीज को जल्द से जल्द बेचकर दूसरों का हक्क मारना चाहते हैं। तिली और बीड़ी अस्पताल के दरमियान स्थित कीमती जमीन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। वैसे इस खेल में कुछ रसूखदार सफेदपोश और भू-माफिया भी पारिवारिक गुटबाजी का फायदा उठाकर अपनी गांकरें सेंक रहे हैं। चर्चा तो ये भी है कि इस बीड़ी फर्म की कतिपय उत्तराधिकारी ” भू-माफिया” सोच की हो चुकी हैं। उदाहरण के लिए बीड़ी अस्पताल वाली जमीन को वे एकड़- डिस्मिल के बजाए वर्गफीट के फिगर में बेचने प्रयासरत हैं। उनकी इस “नई कारोबारी सोच” का दूसरा उदाहरण दिवंगत मैनेजिंग पार्टनर के गुजरने के बाद रजाखेड़ी मकरोनिया स्थित मराठी-गुजराती फर्म की प्रॉपर्टीज हैं। जिसकी डील्स बिना अन्य हिस्सेदारों की रजामंदी के निपटाई जा रही हैं। इस फर्म की विशाल जमीन और गोदाम जिस पर पचास लाख रुपये का सरकारी डायवर्जन शुल्क बकाया है। वहां इन “तेज चाल” पार्टनर ने स्थानीय जनप्रतिनिधि को झांसे में लेकर सरकारी रास्ता और भव्य गेट झटक लिया है। ओवर आल ये तमाम संपत्तियां संगीन कानूनी पेचीदगियों में उलझी हैं। खिलाड़ी खरीदार मुगालते में न रहें। उन्हें किसी नौसीखिया बीड़ी पीने वाले की तरह फदां लग सकता है।
2. चांदी के ‘दाग’ पर सोने की ‘चमक’!
कहते हैं कि हुक्म के गुलामों से चाहे मनचाहा दाग लगवा लो या फिर वाहवाही की नई इबारत लिखवा लो। फिलहाल, सागर पुलिस सुप्रीमो का मिजाज कुछ ऐसा ही जोखिम भरा और तेज़-तर्रार नज़र आ रहा है। महकमे के पूर्ववर्ती साहबान जिस “चांदीकांड” के दागियों से छुआछूत बरतते रहे, मौजूदा सुप्रीमो ने उन्हीं जिला-बदर सिपाहियों और हवलदारों को सीधा मैदान में उतार दिया। फिर क्या था? थानों में वापसी करते ही प्रदीप, मनीष, आशीष और मुकेश की इस ‘चौकड़ी’ ने साहब के भरोसे का ऐसा इकबाल बुलंद किया कि शहर का कुख्यात कटरबाज़ सरगना मनु सोनी सीधे सलाखों के पीछे पहुंच गया। कटरबाज़ी का खौफ तो हवा हुआ ही, साथ ही इस चौकड़ी ने भोपाल में दबिश देकर ऑनलाइन सट्टेबाज़ी के म्यूल खातों से 3 करोड़ की नकदी और सोना जब्त कर कप्तान साहब का कॉलर और ऊंचा कर दिया। अब जाहिर है, जब महकमे में एक टीम कामयाबी के झंडे गाड़ेगी, तो साइबर शाखा से खदेड़े गए वो सूरमा भला कैसे खामोश बैठते जो “लीकेज सिस्टम” के जरिए मलाई सूंतने के आदी थे? महकमे में टीस और रंजिश का माहौल गर्म है। पर एक तजुर्बेकार दारोगाजी का साफ़ कहना है—“साहब, ये तो खाकी का पुराना दस्तूर है, असली बात यह है कि वसूली का हुक्म दो तो वसूली करेंगे, और भोपाल भेजकर जब्ती का हुक्म दो तो करोड़ों की जब्ती कर लाएंगे!”
3. ‘प्योर कांग्रेसी’ का करिश्मा और कुढ़ते ‘ संगी साथी’!
सागर में कांग्रेस की हालत यह है कि जिस दौर में बच्चे पैदा हुए थे, उनके बच्चे अब खुद स्कूलों की चौखट लांघ रहे हैं। लेकिन बेचारों ने अपनी ज़िंदगी में सागर में न तो कोई कांग्रेसी जनप्रतिनिधि देखा और न ही नगर सरकार! वजह एकदम साफ़ है,अंदरूनी गुटबाजी और सत्ताधारियों के साथ पर्दे के पीछे की लपका-ट्यूनिंग। लेकिन हाल ही में ज़िला शहर सेवादल अध्यक्ष सिंटू कटारे के रूप में एक ‘प्योर कांग्रेसी’ का करिश्मा देखने को मिला। समीक्षा बैठक में आए राष्ट्रीय सचिव व प्रदेश प्रभारी प्रतापनारायण मिश्रा और प्रदेशाध्यक्ष अवनीश भार्गव ने जब कटारे की ज़मीनी वर्किंग की तारीफों के कसीदे पढ़े, उन्होंने कहा कि सिंटू के जनता से जुड़ाव की बात पार्टी की राष्ट्रीय व प्रदेश स्तरीय वर्कशॉप, मीटिंग्स में होती रहती है इधर ये सुनते ही ज़िले के कई ‘कागज़ी’ नेताओं के पेट में मरोड़ उठने लगी। तारीफ पचती भी कैसे? ये तो वो लोग हैं जो अपनी पार्टी को छोड़कर बाकी हर झंडे की जी-हज़ूरी के लिए तैयार रहते हैं। इस पर सिंटू भाई का बेबाक अंदाज़ काबिले-तारीफ है। उनका कहना था “हम अपना काम नहीं छोड़ेंगे और ये लोग अपने कुसगुन नहीं छोड़ेंगे!” बात तो सही है, पर मलाल बस इतना है कि अगर यही गुटबाज़ी जारी रही, तो ‘बच्चों के बच्चों के भी बच्चे’ हो जाएँगे, पर कांग्रेस सागर की सत्ता से महरूम ही रहेगी।
4. ‘मैनेजमेंट’ के प्रोफेसर साहब की ‘अनमैनेज्ड’ ढाल!
डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के एमबीए विभाग के पूर्व एचओडी प्रो. श्री भागवत इन दिनों हाफ-पे सैलरी की ज़द में आकर घर पर आराम फरमा रहे हैं। आरोप यह है कि प्रोफेसर साहब मूलतः ओबीसी वर्ग से होकर बरसों से एससी कोटे की मलाई चाप रहे थे। जब कागज़ात मांगे गए, तो साहब हाथ खड़े कर बैठे। नतीजतन, कार्यवाहक कुलपति प्रो. वायएस ठाकुर ने बिना देर किए निलंबन का फरमान जारी कर दिया। वैसे, इस ताबड़तोड़ कार्रवाई के पीछे भले ही कार्यवाहक कुलपति के अपने निज-स्वार्थ की चर्चाएं हों, लेकिन किसी दूसरे के हक पर डाका डालने का हिसाब तो होना ही था। मजे की बात यह है कि ज़माने भर के छात्रों को ‘मैनेजमेंट’ के दांव-पेच सिखाने वाले प्रोफेसर साब खुद की इतनी बड़ी मुसीबत को मैनेज करना भूल गए। विवि के सबसे बड़े अफसर ने तो काफी पहले ही आगाह कर दिया था कि कागज़ दुरुस्त करा लो, वरना आधी तनख्वाह पर गुज़ारा करना पड़ेगा, पर प्रोफेसर साहब बेफिक्र रहे। अब सस्पेंड होने के बाद वे कोर्ट या मंत्रालय का दरवाजा खटखटाने के बजाय बस एक ही इंतज़ार में बैठे हैं—कब इंचार्ज कुलपति साहब रिटायर हों और कब उनकी किस्मत का ताला दोबारा खुले!….
9425172417…20/08/2026



