नारदवाणी: इधर भाजपा के सोशल मीडिया “एक्सपर्ट” का नॉन-सोशल व्यवहार उधर कांग्रेस में हाथी वाले, रेल वाले, मछली वाले का ओबीसी… ओबीसी आलाप !

नारदवाणी में आज यहां-वहां की उठा-पटक के अलावा दोस्ती और मानवता को एक अलग ऊंचाई देता किस्सा भी पढ़ें।
1. सोशल मीडिया “एक्सपर्ट” का नॉन-सोशल व्यवहार
व्यवहारिकता और धंधे का सीधा नियम है—माल लिया है तो काम करो, और काम न हो पाए तो माल वापस करो। लेकिन हमारे सत्ताधारी दल के एक स्वघोषित सोशल मीडिया ‘एक्सपर्ट’ महोदय डिजिटल दुनिया से बाहर निकलते ही सारे नियम-कायदे भूल जाते हैं। बीते तबादला सीजन में उन्होंने संभाग भर के ट्रांसफर-इच्छुक किरदारों से ‘एडवांस’ की मोटी रकम यह कहकर झटक ली कि “अपुन का जलवा है।” पर इस बार पासा उलटा पड़ गया। जिलों के प्रभारी मंत्रियों से लेकर ऊपर तक सब सीधे ‘सुनवाई मोड’ पर एक्टिव थे, सो बीच के इन ‘डिजिटल दलालों’ की दाल गलना तो दूर, पतीली तक नहीं चढ़ पाई। अब स्थिति यह है कि एडवांसदाता इन एक्सपर्ट साहब के आगे-पीछे चक्कर काट रहे हैं कि “मालिक, काम तो हुआ नहीं, अब हमारे ‘गांधी जी’ तो वापस कर दो।” लेकिन एक्सपर्ट साहब भी उस्ताद हैं; जितने घुंघराले उनके बाल हैं, उतनी ही घुमावदार बातें बनाकर शिकारों को टरका रहे हैं। पर वे यह भूल रहे हैं कि हर कोई सिर्फ बातें नहीं सुनता। एक पीड़ित एडवांसदाता ने तो साफ शब्दों में चेतावनी दे डाली है कि “ये गांधी जी पुरव्याऊ वाले जीजाजी से उधार मांगकर लाए थे, अगर सीधे-सीधे वापस नहीं मिले, तो गांधी का मार्ग छोड़ हिंसा का रास्ता अपनाने में देर नहीं लगेगी।” अब देखना है कि इन एक्सपर्ट साहब के ‘फॉलोअर्स’ सोशल मीडिया पर बढ़ते हैं या थाने के चक्कर!
2. कांग्रेस में हाथी वाले, रेल वाले, मछली वाले का ओबीसी… ओबीसी आलाप !
कांग्रेस की अंतर्कलह और गुटबाजी का ‘सागर’ कभी शांत नहीं होता। अभी कुछ दिन पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पिछड़ा वर्ग विभाग के एक बड़े नेताजी सागर पधारे थे। तय परंपरा के अनुसार, शहर अध्यक्ष ने अपने कार्यालय में उनके स्वागत-सत्कार के साथ मीटिंग शुरू की। लेकिन कांग्रेस में जब तक रायता न फैले, मीटिंग पूरी कैसे हो? अचानक ‘हाथी’ छाप अतीत वाले कांग्रेसी और उनके रंग-बिरंगे फॉलोअर्स वहां प्रकट हुए और जोर-जोर से ‘ओबीसी-ओबीसी’ का आलाप जपने लगे। उत्साह का आलम यह था कि वे आधिकारिक मीटिंग रजिस्टर छीनकर खुद ही पूरी कार्रवाई का ब्योरा दर्ज करने पर उतारू हो गए। बस, यहीं शहर अध्यक्ष की ‘अध्यक्षी’ जाग गई। उन्होंने साफ कर दिया कि संगठन अनुशासन से चलता है, हुड़दंग से नहीं। अध्यक्ष जी ने आव देखा न ताव, ‘हाथी’ वाले से लेकर ‘रेल’ वाले और ‘मछली’ वाले तक, सबकी ऐसी हेकड़ी उतारी कि सब चुप्प हो गए। इस डांट-फटकार का असर यह हुआ कि ‘मछली’ वाले नेता जी यानी मछुआ कांग्रेस अध्यक्ष ने आहत होकर तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इधर, शहर अध्यक्ष भी टस से मस नहीं हुए; वे मुस्कुराते हुए बोले—”पार्टी रूपी तालाब को साफ और स्वच्छ रखने के लिए अगर कुछ मछलियां बाहर जाती हैं, तो यह सौदा मंजूर है।” संगठन की इस ‘सफाई’ पर बाकी कांग्रेसी बस तमाशा देखते रह गए।
3. मालथौन का कैट वाला बागड़ बिल्ला और सफेद शेर की बैकिंग
मध्य प्रदेश सरकार ने उद्योगपतियों और व्यापारियों के हितों के लिए जिला स्तर पर संगठन बनाने की नीति क्या जारी की, सागर के कुछ ‘घाघ’ और मौकापरस्त तत्वों की बांछें खिल गईं। इन संगठनों के गठन की तारीखें भले ही अभी पर्दे के पीछे हों, लेकिन एक महाशय अपना ‘भाग्योदय’ कराने के लिए अफसरों और नेताओं की चौखटों के चक्कर काटने में जुट गए हैं। ये महाशय खुद को बहुत बड़े ‘उद्योगपति’ के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं, जबकि असलियत यह है कि इनका मुख्य कारोबार चाय और माचिस की केवल ट्रेडिंग और परिवार के नाम पर चलने वाला ‘दो नंबर की बीड़ी’ का सट्टा है। इसी सट्टे के दम पर सागर में रहकर इन्होंने धार्मिक ट्रस्टों और प्रापर्टी के धंधे में पैर पसारे और बेहिसाब जायदाद खड़ी कर ली। स्वभाव से बेहद शातिर (बिल्ला की तरह) मिठबोला शख्स सागर के वास्तविक और प्रतिष्ठित व्यवसायियों को किनारे लगाकर, व्यापारिक संगठनों के शीर्ष पदों को हथियाने के चक्रव्यूह रच रहा है। भोपाल से लेकर सागर के सचिवालयों तक इसकी सक्रियता देखने लायक है। खुद को एक प्रभावशाली जनप्रतिनिधि का खास बंदा बताता है, लेकिन असल में इतना चपल है कि मौका मिलते ही अपने इसी गॉडफादर की कुर्सी खींचने की फिराक में रहता है। हाल ही में विचार परिवार के एक बड़े आयोजन में इसने अपनी चपलता दिखाते हुए जबरन मंच संचालन हथिया लिया। मंच पर मौजूद असली उद्योगपति और व्यापारिक प्रतिनिधि इस ‘सट्टेदार कम प्रापर्टी डीलर’ को अपना प्रतिनिधित्व करते देख भीतर ही भीतर असहज हो रहे थे। मालथौन से सागर तक का यह ‘बागड़ बिल्ला’ यदि समय रहते न पहचाना गया, तो शहर के वास्तविक उद्योगपतियों और नेताओं को भारी चपत लगाएगा।
4. घूसखोर मगरमच्छ और ‘पनया सांप’ की वफादारी
सिविल लाइंस में अखबार के दफ्तरों के ठीक बीचोबीच स्थित एक केंद्रीय एनफोर्समेंट महकमा इन दिनों चर्चाओं में है। यहां के एक ‘बाबू रसिया’ अपनी अजीबोगरीब कार्यशैली के लिए कुख्यात हैं। केंद्रीय सेवा में होने के बावजूद इनका सागर से ऐसा फेविकोल का जोड़ है कि ट्रांसफर होने के बाद भी ये कभी सागर से बाहर रह ही नहीं पाते। इंदौर, भोपाल या जबलपुर पोस्टिंग हो भी जाए, तो इनका सूटकेस खुलने और कपड़े दोबारा प्रेस होने से पहले ये वापस सागर में ‘लॉबिंग’ की पिच पर बैटिंग करते पाए जाते हैं। इन ‘बाबू रसिया’ ने इस बार अपनी लॉबिंग की ताकत विभाग के ही एक महा-भ्रष्ट ‘घूसखोर मगरमच्छ’ को बचाने में झोंक दी है। यह वही मगरमच्छ है जिसे कुछ समय पहले ‘बीड़ी क्वीन’ (लोकल एलिजाबेथ) के पोते ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) के जाल में रंगे हाथों फंसवाया था। अब इस मगरमच्छ की चमड़ी बचाने के लिए बाबू साहब सिविल लाइंस से लेकर कोर्ट रोड तक एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। व्यापार जगत में इन बाबू साहब की छवि उस ‘पनया सांप’ (पानी वाले सांप) जैसी है, जो सीधे जान तो नहीं लेता, लेकिन पेट भरने के लिए छोटी मछली, चूहे और मेंढक जैसी रिश्वतें लगातार गटकता रहता है। बहरहाल, घूसखोर मगरमच्छ के इस नाटक का क्लाइमेक्स बेहद करीब है। अब देखना यह है कि यह ‘दी एंड’ सुखांत (हैप्पी एंडिंग) होता है या दुखांत, और यह पनया सांप मगरमच्छ को बचा पाता है या खुद भी जाल में फंसता है।
5. और आखिर में…. “दोस्तों” तुम जियो साल… साल के दिन
कहते हैं कि संकट के समय जब कॉरपोरेट की औपचारिकताएं और सिस्टम के कानून हाथ खड़े कर देते हैं, तब सिर्फ एक ही रिश्ता ढाल बनकर खड़ा होता है—और वह है ‘दोस्ती’। मकरोनिया रोड पर कार लोन के विवाद के बाद हुई आत्मदाह की खौफनाक घटना हम सबने सुनी। लेकिन उस जलती आग के बीच, अपनी जान की परवाह न करते हुए दूसरों को बचाने कूदे फाइनेंस कंपनी के जांबाज मैनेजर अतुलसिंह तोमर आज जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। अतुलसिंह बुरी तरह झुलस गए थे। स्थानीय अस्पताल में जब स्थिति बिगड़ती दिखी, तो डॉक्टरों ने उन्हें दिल्ली के सफदरजंग बर्न स्पेशियलिटी अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह दी। समय बेहद कम था और रास्ता सिर्फ एक था—’एयर एम्बुलेंस’। डॉक्टरों ने सड़क मार्ग से ले जाने की सख्त मनाही की थी। अतुलसिंह के परिजनों और दोस्तों ने उस फाइनेंस कंपनी के आला अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए, जिसके लिए अतुल ने अपनी जान दांव पर लगाई थी। लेकिन संवेदनहीन कॉरपोरेट ढर्रे के मुताबिक, कंपनी सीधे मदद करने के बजाय टालमटोल और कागजी बहानों पर उतर आई। तभी इस कहानी में दोस्ती का वह स्वर्णिम अध्याय शुरू हुआ जो मिसाल बन गया। अतुलसिंह के अजीज दोस्त अखिलेश ‘मोनी’ केशरवानी उस वक्त विदेश में थे। जैसे ही वे वतन लौटे, उन्होंने औपचारिकताएं निभा रही फाइनेंस कंपनी को सीधे आड़े हाथों लिया। मोनी केशरवानी ने कंपनी को एक कड़ा और भावुक ईमेल भेजा, जिसमें लिखा: “शायद आपको अपने उस कर्मचारी की कद्र न हो जिसने एक अनजान शख्स को बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। लेकिन हमें अपने दोस्त की जान की कद्र है। उसे एयरलिफ्ट कराने में 10-15 लाख रुपये का जो भी खर्च आएगा, वह पूरा मैं अकेला वहन करूंगा, लेकिन आप लोगों की ये टाल-मटोल कतई बर्दाश्त नहीं करूंगा।” इस एक ईमेल और दोस्त के इस फौलादी संकल्प ने शायद कंपनी के बड़े अफसरों की सोई हुई इंसानियत और शर्म को जगा दिया। कुछ ही मिनटों के भीतर कंपनी ने एयर एम्बुलेंस का अप्रूवल जारी कर दिया और अतुलसिंह को दिल्ली शिफ्ट कर दिया गया। यह किस्सा सिर्फ एक दोस्त की जान बचने का नहीं है, यह इस बात का प्रमाण है कि इस मतलबी दुनिया में आज भी मुनव्वर राना की वो पंक्तियां जिंदा हैं—’मशक्कत का सिला, यारी का अहसान देखना हो, तो आकर संकट में दोस्तों का ईमान देखना…’। जिसने भी इस घटनाक्रम को सुना, उसकी नम आंखे और जुबां पर बस एक ही दुआ थी—” दोस्तों तुम जियो हजारों साल, और साल के दिन हों पचास हजार!”
सागरवाणी डेस्क…….9425172417



