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विवि: फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में प्रो. भागवत निलंबित, विवि में प्रवेश पर प्रतिबंध!

विवि स्तरीय जांच में प्रो. भागवत के नियुक्ति दस्तावेजों में अजा वर्ग का जाति प्रमाणपत्र नहीं मिला

सागर। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में व्यावसायिक प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर और वाणिज्य एवं प्रबंधन के डीन प्रो. श्री भागवत को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। कुलसचिव एसपी उपाध्याय द्वारा जारी निलंबन आदेश के अनुसार, प्रो. भागवत पर अपनी प्रारंभिक नियुक्ति के समय प्रस्तुत किए गए अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र के संबंध में अमान्य एवं असत्य दावा पेश करने के गंभीर आरोप हैं। निलंबन अवधि के दौरान उन पर कड़े प्रतिबंध लागू करते हुए स्पष्ट आदेश दिया गया है कि वे पूर्व लिखित अनुमति के बिना या अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में आवश्यकता होने के अलावा विश्वविद्यालय के किसी भी कार्यालय या प्रशासनिक अनुभाग में प्रवेश नहीं करेंगे।

जांच रिपोर्ट में प्रो.भागवत, ओबीसी
से बताए गए

इस मामले की जड़ें वर्ष 2005 में हुई उनकी नियुक्ति से जुड़ी हैं। 16 अप्रैल 2005 को प्रो. भागवत की नियुक्ति व्याख्याता के रूप में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पद पर की गई थी। हाल ही में इस जाति प्रमाण पत्र की प्रामाणिकता को लेकर शिकायतें सामने आईं, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने 30 जुलाई 2026 को एक जांच समिति का गठन किया। 3 अगस्त 2026 को पुनर्गठित इस समिति ने अभिलेखों का सूक्ष्म परीक्षण करने के उपरांत 5 अगस्त 2026 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। जांच समिति के निष्कर्षों के अनुसार, रिकॉर्ड में सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया कोई भी वैध स्थायी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र मौजूद नहीं पाया गया। साथ ही, जिस प्रमाण पत्र को प्रस्तुत किया गया था, उसकी पुष्टि संबंधित जारीकर्ता प्राधिकारी के अभिलेखों से नहीं हो सकी। सक्षम प्राधिकारियों की प्राथमिक सत्यापन रिपोर्टों से यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि प्रो. भागवत मूलतः उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर जिले में ‘बिंद समुदाय’ से आते हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग अंतर्गत आता है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में माना कि आरक्षित पद पर यह नियुक्ति गलत दावे के आधार पर प्राप्त की गई थी। क्योंकि उन्होंने स्वयं को छत्तीसगढ़ के अजा वर्ग का व्यक्ति बताया था।वित्तीय क्षति एवं साक्ष्यों से छेड़छाड़ का बताया डर

जांच समिति की सिफारिशों पर गंभीरता से विचार करते हुए सक्षम प्राधिकारी ने पाया कि आरोप बेहद संगीन हैं और यह सीधे तौर पर कर्मचारी की पात्रता से जुड़े हैं। प्रशासन का मानना है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित रहने के दौरान प्रो. भागवत का सेवा में बने रहना न केवल सरकारी खजाने से लगातार वेतन एवं वित्तीय लाभों के भुगतान का कारण बनेगा, बल्कि डीन जैसे प्रभावशील पद पर रहने के कारण वे गवाहों और अभिलेखों को प्रभावित भी कर सकते हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय सिविल सेवाएं (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1965 के तहत उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय विश्वविद्यालय परिसर रहेगा और वे बिना पूर्व अनुमति के मुख्यालय नहीं छोड़ सकेंगे।

द्वेशपूर्ण कार्रवाई, कोर्ट जाऊंगा: प्रो. भागवत
यह एक द्वेशपूर्ण कार्रवाई है। महज तीन-चार दिन में मेरे खिलाफ जांच कर ली गई। मुझ से पक्ष ही नहीं लिया गया। मैं इस मामले में सक्षम न्यायालय की शरण लूंगा।

तीन दिनी जांच, विभागीय अदावत और पुत्र की नियुक्ति !

एक तरफ जहां विश्वविद्यालय प्रशासन मात्र तीन दिनी जांच के आधार पर प्रो. भागवत के निलंबन को वैधानिक कार्रवाई बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के अंदरूनी हलकों में इस कार्रवाई के समय और मंशा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति का दायित्व प्रो. वायएस ठाकुर के पास है, जो मूल रूप से एमबीए विभाग के अध्यक्ष हैं। प्रो. श्री भागवत और प्रो. ठाकुर के बीच की पुरानी विभागीय अदावत किसी से छिपी नहीं है। यही वजह है कि विश्वविद्यालय परिसर में इस त्वरित निलंबन को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया न मानकर पुरानी रंजिश और प्रतिशोध से प्रेरित कार्रवाई के रूप में भी देखा जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू प्रभारी कुलपति के पुत्र से जुड़ा हुआ है। हाल ही में प्रो. ठाकुर के पुत्र डॉ. मेघवंत सिंह का एमबीए विभाग में विवादास्पद परिस्थितियों में बतौर संविदा शिक्षक चयन हुआ है। चूंकि प्रभारी कुलपति प्रो. ठाकुर अगले महीने ही रिटायर हो रहे हैं, ऐसे में विश्वविद्यालय के प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि उनकी सेवानिवृत्ति के बाद उनके पुत्र की नियुक्ति पर प्रो. भागवत कोई कानूनी या प्रशासनिक बाधा न खड़ी कर सकें, इसलिए उनके खिलाफ यह कदम उठाया गया है।

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