नारदवाणी में आज पद्म पुरस्कार की लॉबिंग और बाबू के बट्टे की कहानी

1. ‘पद्म’ पाने की बीड़ी बाजी: जमीनों का सौदा और ‘बगुला रंग’ की लाबिंग
बीड़ी क्वीन सागर की एलिजाबेथ ने पद्म अवार्ड का ख्वाब पूरा करने के लिए इस साल अपनी हिकमतों को और तेज कर दिया है। पिछली बार पद्म न मिलने पर इन महारानी की बहुरानी को लक़वा मार गया था। उम्र के दिसंबर में पहुंची यह छद्म समाज सेविका देश के वामपंथी, अर्बन नक्सल गिरोहों को इमदाद करते हुए कांग्रेसी और भाजपाइयों संग गम्मतों पर गम्मत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। यही गुर उनकी विजय माल्या जैसों से ‘ख़ुशगवार ताल्लुक़ात’ रखने वाली राजकुमारी ने सीखे हैं। जो अपनी ममा की तरह संस्थाओं पे क़ब्ज़ा जमाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। दिल्ली बेस्ड दामाद ने तो बीड़ी संघों, कृषि उपज मंडी से लेकर कृषि भूमियों तक लूट मचा ही रक्खी है। ताजा खबर ये है कि अब मां-बेटी और दामाद की तिकड़ी ने दिल्ली में राष्ट्रवादी सत्ता संगठन के गलियारों में पद्म अवार्ड की लाबिंग के लिए एक बार फिर एजेंट हायर कर लिए हैं। आवेदन की फाइल बीते साल की ही है। जिसमें कुछ सिफारिशें, कुछ बनावटी उपलब्धियां बढ़े हुए वजन के साथ हैं। वैसे इस मर्तबा “बगुला रंग” की पोशाक पहनने के लिए खुल्ला ऑफर है कि पद्म दिलाओ जमीनों के सौदे पाओ। क्वीन के पास ससुराल से हथियाई क्रीम जमीनों का लेंड बैंक है। भू-माफियाओं के सरपरस्तों को इन्हीं जमीनों के सस्ते सौदों का लालच दिया गया है। ये बताने की जरूरत नहीं है कि बीड़ी क्वीन इतनी निष्ठुर है कि बीते साल अपने अर्दली के जीवट बेटे ने अखाड़े के जौहर से जब उन्हें पद्म अवार्ड की रेस में हराया तो उन्होंने उसकी शक्ल देखना गवारा नहीं किया। देहावसान पर मातमपुर्सी को भी नहीं पहुंचीं। इस साल के टफ कांपिटीशन में योगाचार्य विष्णु आर्य फिर से तगड़े दावेदार हैं। बावजूद इसके कि बीड़ी क्वीन को योगा सिखा कर स्वस्थ रखने में उन्हीं की अहम भूमिका रही है लेकिन जब योगाचार्य अस्पताल में दाखिल रहे तो मंत्री संतरी सब उन्हें देखने पहुंचे लेकिन तेंदुकट राजमाता ने उन्हें देखना तो दूर सेहत की तक खबर नहीं ली। बहरहाल वे जानती हैं कि इस बार भी टक्कर “योग बनाम रोग” की है। राजमाता की बीड़ी का समाज में क्या योगदान है। यह बीते हफ्ते ही सागर की तीनबत्ती पर सबने देखा। जब सागर के पितामह डॉ. हरी सिंह गौर की ऐतिहासिक मूर्ति के पैडस्टल पर चढ़कर एक शराबी ने उनके मुंह से जलती बीड़ी लगा कर कहा कि “ले ओ गौरबब्बा तुम भी कश लगाओ और टेस्ट करके बताओ कड़क सिकी के अबै कसर रै गई”। आखिर में तो यही कहेंगे कि ऐसे संतरी-मंत्री, नेता, नेत्रियों, अफसरों, बाबुओं का क्या कहना जिन्होंने ऐसे छद्म को पद्म के लिए अग्रसर किया।
2. “सबमें बड़े साहब” की ऑनलाइन खरीदी का बिल बाबू के नाम फटा
किस्सा कुछ देर से खुला। माजरा ये है कि कुछ महीने पहले तक जिले में पदस्थ रहे “सबमें बड़े साहब” धड़ाधड़ ऑनलाइन खरीदी करते रहते थे। पेमेंट, ऑफिस के एक बाबू करते थे। ये वे बाबू हैं जिनके पास ऑफिस में आई एक- एक कील से लेकर कम्प्यूटर, घोड़ा-गाड़ी वगैरह का हिसाब रहता है। अब हुआ ये है कि साहब तबादला पर चले गए हैं और बाबू दो कम पूरे बीस लाख रु. के बिल लिए घूम रहे हैं। हालांकि जाते-जाते साहब इन बाबू से कह गए कि ये सारा पेमेंट मेरे चैम्बर की लाइन में बैठने वाले नंबर-2 साहब कर देंगे। लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। बोले, “बाबू जी” अगर ये सब सामान खरीदा भी गया है तो उसकी आपके रजिस्टर में इंट्री तो होगी। हो तो ले आइए पेमेंट हो जाएगा। बेचारे बाबू जी उस दिन को कोस रहे हैं जब उन्होंने पहली बार सब में बड़े साहब के बंगले पर पहली बार कदम रखा था।
3. कानून वालों के चुनाव है तो क्या हुआ….भाजपा है तो सब मुमकिन है
जिला अधिवक्ता संघ के मौखिक तौर पर विजयी अध्यक्ष की खुशियां 72 घंटे भी नहीं टिकी। 25 अगस्त को राज्य अधिवक्ता परिषद ने री- काउंटिंग का फरमान जारी कर दिया। आज से 72 घंटे बाद यानी बुधवार को तय हो जाएगा कि विजयी घोषित प्रत्याशी को प्रमाण -पत्र मिलेगा या नंबर- दो पर रहे को। इन शार्ट बार रूम्स से लेकर शेड-दर-शेड चर्चा ये है कि नंबर- 2 के जीतने के समीकरण बैठा लिए गए हैं। जो 5 वोट एक्सिस दिख रही है। खेल वहीं से शुरू होगा। हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज साहब आ रहे हैं। अच्छा-खासा पुलिस बल रहेगा। सो ज्यादा चूं-चपड़ भी नहीं होगी। कहते हैं न कि…… भाजपा है तो मुमकिन है।
4. 20 की स्पीड में हेलमेट की जिद बनाम स्टंट्स पर रोकथाम
कलेक्टर महोदया का यह ‘हेलमेट सुरक्षा चक्र’ सचमुच प्रशासनिक दूरदर्शिता की मिसाल है! शहर की सड़कों पर जहां गड्ढों और अनियंत्रित यातायात के बीच हेलमेट नियम दम तोड़ रहा है, वहां कलेक्टर कार्यालय के 10 की स्पीड वाले परिसर को देश का सबसे ‘सुरक्षित ज़ोन’ घोषित कर दिया गया है। अरे साहब, यह आम आदमी का प्रवेश रोकना थोड़ी है, यह तो जनता को ‘हेलमेट संस्कार’ सिखाने की कड़ी तपस्या है! अब कोई अपनी समस्या, अर्जी या रोना लेकर आए, तो पहले हजार- 500 रुपये का हेलमेट खरीदे। आखिर ‘कलेक्टर साहिबा से मिलने की अपनी एक आर्थिक और सुरक्षात्मक पात्रता होनी ही चाहिए। बताया जा रहा है कि पूर्ववती कलेक्टर की तर्ज पर “मैडम” ने जनसुनवाई में कतिपय यू-ट्यूबर्स द्वारा रची स्टंटबाजी वाली शिकायतों से निपटने के लिए भी ‘रिपीटेड स्ट्रोक’ खेला है। जब फरियादी ही बाहर रुक जाएगा, तो दफ्तर में कागजी सुशासन और शांति का झंडा अपने आप बुलंद रहेगा!
सागरवाणी...9425172417



