डॉ. गौर विवि: प्रभारी कुलपति की ‘जिद’ पर ईसी ने लगाया ब्रेक, कानूनी फजीहत से बचे सदस्य

सागर। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में बुधवार को हुई कार्य-परिषद (ईसी) की आपातकालीन बैठक किसी हाई-वोल्टेज ड्रामे से कम नहीं रही। मुख्य प्रशासनिक भवन की दीवारों ने न केवल तीखी बहस सुनी, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग और व्यक्तिगत रंजिश के आरोपों के बीच एक प्रभारी कुलपति की असहाय स्थिति को भी देखा। बैठक का माहौल उस वक्त तनावपूर्ण हो गया जब एक ईसी सदस्य ने प्रभारी कुलपति प्रो. वायएस ठाकुर को आईना दिखाते हुए दो-टूक कहा— “भूलिए मत, आप केवल प्रभारी कुलपति हैं। अपनी जिद के कारण आप हमें भी कानूनी झमेले में फंसा देंगे।”
व्यक्तिगत एजेंडा और पद की मर्यादा
यह पूरा विवाद एमबीए विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. श्री भागवत की वैवाहिक स्थिति को लेकर बुलाई गई ‘सिंगल एजेंडा’ बैठक के इर्द-गिर्द केंद्रित था। विश्वविद्यालय के गलियारों में चर्चा है कि प्रभारी कुलपति प्रो. ठाकुर, प्रो. भागवत की लगातार घेराबंदी कर रहे हैं। इस आपात बैठक का एकमात्र उद्देश्य प्रो. भागवत के विरुद्ध आरोप-पत्र (चार्जशीट) जारी करना था। विडंबना देखिए कि जिस मुद्दे को सुलझाने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला जुटा, उसे ईसी के सदस्यों ने अंततः ‘अवैधानिक’ और ‘अधिकार क्षेत्र से बाहर’ करार दे दिया।
करीब एक घंटे तक चली इस गहमागहमी भरी बैठक में सदस्यों ने स्पष्ट किया कि प्रभारी कुलपति के पास ऐसे नीतिगत या दंडात्मक निर्णय लेने का नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं है, जिनका भविष्य में दूरगामी प्रभाव पड़े। सदस्यों का तर्क था कि इसी साल प्रो. ठाकुर सेवानिवृत्त हो रहे हैं, ऐसे में उनके जाने के बाद पैदा होने वाली कानूनी पेचीदगियों के लिए कौन जवाबदेह होगा ?
रोटेशन और रंजिश की कहानी
विश्वविद्यालय के जानकारों की मानें तो इस पूरी कवायद के पीछे ‘अकादमिक राजनीति’ और ‘पुत्र-मोह’ की बू आ रही है। चर्चा है कि प्रो. ठाकुर नहीं चाहते कि प्रो. भागवत दोबारा विभागाध्यक्ष (एचओडी) बनें या डीन के पद पर रहें। इसके पीछे की मुख्य चिंता उनके पुत्र डॉ. मेघवंत सिंह ठाकुर से जुड़ी बताई जा रही है, जिनकी नियुक्ति हाल ही में एमबीए विभाग में संविदा आधार पर हुई है। रोटेशन प्रणाली के तहत प्रो. भागवत पुनः एचओडी बनने की कतार में हैं, और प्रभारी कुलपति को डर है कि कहीं उनके रिटायरमेंट के बाद प्रो. भागवत उनके पुत्र के करियर को प्रभावित न कर दें। इसी ‘भय’ के चलते एक रिटायर्ड जज से आनन-फानन में आरोप-पत्र का मसौदा तैयार कराया गया, जिसे ईसी ने सिरे से खारिज कर दिया।
कोर्ट की चेतावनी और वोटिंग का दांव
बैठक में उस वक्त सन्नाटा खिंच गया जब एक सदस्य ने प्रो. भागवत द्वारा भेजे गए ई-मेल का हवाला दिया। प्रो. भागवत ने पहले ही आगाह कर दिया था कि नियमित कुलपति की अनुपस्थिति में लिया गया कोई भी दंडात्मक निर्णय अवैध होगा। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि उनके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई की गई, तो वे ईसी के प्रत्येक सदस्य को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पक्षकार बनाएंगे। बताया जाता है किइस चेतावनी ने ईसी सदस्यों के माथे पर पसीना पहले ही ला दिया था। बावजूद इसके, प्रभारी कुलपति आरोप-पत्र देने की अपनी जिद पर अड़े रहे। जब दलीलों से बात नहीं बनी, तो उन्होंने ‘वोटिंग’ का आखिरी दांव खेला। लेकिन यहाँ भी उन्हें करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। बहुमत ने स्पष्ट रूप से प्रो. भागवत के पक्ष में मतदान करते हुए आरोप-पत्र की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया। ईसी ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि इस संवेदनशील मामले पर केवल ‘नियमित कुलपति’ ही अपने विवेक से निर्णय लेने के लिए अधिकृत होंगे।
प्रशासन का ‘मिनट्स’ वाला मौन
इस पूरे घटनाक्रम पर विश्वविद्यालय प्रशासन बचाव की मुद्रा में है। जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) डॉ. विवेक जायसवाल ने बैठक और उसके एजेंडे की पुष्टि तो की, लेकिन निर्णयों पर गोपनीयता की चादर ओढ़ ली। उन्होंने कहा कि बैठक प्रो. भागवत की वैवाहिक जानकारी से संबंधित थी, लेकिन जब तक आधिकारिक ‘मिनट्स’ जारी नहीं हो जाते, तब तक कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
सागरवाणी…9425172417
15/04/2026



