साहित्य और संस्कृति

रंग-समीक्षा: ‘हमारे राम’ में रावण का एकाधिकार

नायक पर भारी पड़ता खलनायक

सागर। शहर के महाकवि पद्माकर सभागार में मंचित महानाट्य ‘हमारे राम’ को देखना एक अनूठा रंग-अनुभव रहा। ख्यात अभिनेता आशुतोष राना इन दिनों लगातार एक जुमला दोहरा रहे हैं—”वित्त लगाकर चित्त लगाइए।” यानी जेब ढीली कीजिए और पूरे मनोयोग से थिएटर का आनंद लीजिए। खैर, हमारे एक युवा उद्योगपति मित्र के सौजन्य से हमें ‘वित्त’ तो नहीं लगाना पड़ा, लेकिन ‘चित्त’ हमने बतौर दर्शक शत-प्रतिशत लगाया। ​पूरे तीन घंटे के इस मंचीय कोलाज को अगर एक रंग-समीक्षक की दृष्टि से देखा जाए, तो यह नाटक ‘हमारे राम’ से ज्यादा ‘दशानन रावण का एकालाप’ बनकर उभरता है। पूरे कथानक में आशुतोष राना बतौर रावण इस कदर छाए रहते हैं कि मुख्य किरदारों का संतुलन डगमगा सा जाता है। ​सिनेमैटिक और थियेट्रिकल भाषा में कहें तो इस प्रस्तुति में रावण को ‘स्टेज टाइम’ और संवादों का ‘शेयर’ बहुत भारी भरकम दिया गया है। इसके पीछे के रंगमंचीय और व्यावहारिक समीकरण भी साफ समझ आते हैं।​ पूरी नाट्य मंडली में आशुतोष राणा ही एकमात्र ‘स्टार वैल्यू’ वाले अभिनेता हैं, जिन्हें देखने दर्शक आते हैं। नाटक के सह-लेखक, निर्देशक और स्वयं श्रीराम की भूमिका निभा रहे राहुल आर.भुचर ने यह स्वीकार किया है कि राना साहब के आने के बाद इस महानाट्य की स्क्रिप्ट में व्यापक संशोधन किए गए। जिसका मंचीय ​नतीजा यह हुआ कि राहुल भुचर का अभिनय प्रभावशाली होने के बावजूद आशुतोष राना के भारी-भरकम संवादों, लगातार बदलती भव्य वेशभूषा और भगवान शिव, हनुमान, शूर्पणखा व सीता के साथ उनके तीखे संवाद-प्रतिवाद के शोर में कहीं दबकर रह गया। ​रंगमंच की दृष्टि से नाटक का पहला घंटा बेहद कसा हुआ है। इसमें रावण के उस अंतर्द्वंद्व को उभारा गया है जहां वह स्वयं श्रीराम के हाथों मोक्ष (मृत्यु) की कामना करता है। महानाट्य में उन बिन्दुओं को छुआ गया है जो रामानंद सागर के सीरियल रामायण या रामचरितमानस आधारित धारावाहिकों में नेपथ्य (पीछे) में छोड़ दिए गए। उदाहरण के लिए जब रावण, श्रीराम से पूछता है—”आप सर्वज्ञ थे, तो समय रहते मुझे कुल के विनाश की चेतावनी क्यों नहीं दी?” तब राम का उत्तर आता है—”मैं वनवास की मर्यादा में था, लंका नहीं आ सकता था, पर मैंने मारीच, अंगद, हनुमान और विभीषण के जरिए तुम तक संदेश भेजे थे।” ​नाटक का चरमोत्कर्ष रावण-लक्ष्मण संवाद है, जो इस पूरी प्रस्तुति के ‘रावण-केंद्रित’ होने का तार्किक औचित्य सिद्ध कर देता है। रावण का यह दर्शन बेहद सटीक बन पड़ा है कि ​”मित्र चुनने से ज्यादा सावधानी शत्रु चुनने में बरतनी चाहिए। यदि शत्रु बड़ा होगा, तो आपका कद स्वतः ही बड़ा हो जाएगा। मैंने साक्षात नारायण को शत्रु चुना, इसीलिए मेरा कद विराट है।” ​मुख्य किरदारों के अलावा, यदि किसी पात्र ने मंच पर वास्तविक ‘थियेट्रिकल लाउडनेस’ और कॉमिक रिलीफ पैदा किया, तो वह थीं तृप्ति कुमार (शूर्पणखा)। उनके नाटकीय अभिनय और आंगिक चेष्टाओं ने दर्शकों को खूब गुदगुदाया। यही कारण है कि नाटक की समाप्ति पर श्रीराम और रावण के बाद सबसे ज्यादा तालियां उन्हीं के हिस्से आईं।

और आखिर में….भव्यता बनाम अव्यवस्था और ‘बुक माय शो’

​अब बात ‘वित्त’ की। नाटक का न्यूनतम टिकट एक हजार रुपये के आसपास है, जो एक औसत रंग-प्रेमी के लिए काफी भारी है। हालांकि, जब आप पद्माकर सभागार परिसर के भीतर खड़ी तकनीकी गाड़ियां, भव्य साउंड सिस्टम, विशाल स्टेज प्रॉपर्टीज और सिनेमाई इफ़ेक्ट्स देने वाले इक्विपमेंट देखते हैं, तो इस कमर्शियल थियेटर के बजट और टिकट दर को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है। ​परंतु… असली विडंबना सभागार के भीतर की व्यवस्था को लेकर रही। राना साहब बार-बार ‘चित्त’ लगाने की वकालत कर रहे थे, लेकिन 750 की क्षमता वाले इस सभागार का एयर कंडीशनर पूरी तरह ठप था। दर्शकों का ‘चित्त’ अभिनय पर टिकता, उससे पहले पसीने की बूंदें एकाग्रता भंग कर रही थीं। स्थिति यह थी कि एक अकेला पोर्टेबल कूलर कभी इस दरवाजे तो कभी उस दरवाजे पर शिफ्ट किया जा रहा था। ​​हमने भले ही मित्र के सौजन्य से ‘मुफ्त’ में इस भव्यता का रसास्वादन कर लिया हो, लेकिन उन दर्शकों के प्रति पूरी सहानुभूति है जिन्होंने भारी-भरकम ‘वित्त’ भी लगाया और उमस के कारण ‘चित्त’ भी नहीं लगा पाए। राणा जी, अभिनय और आध्यात्म की बड़ी-बड़ी बातें मंच से ठीक हैं, लेकिन आप इस वातानुकूलित दुरावस्था को लेकर ‘बुक माय शो’ और स्थानीय प्रबंधकों से जवाब-तलब जरूर कीजिएगा !

​— सागरवाणी…9425172417

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