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पैरोल से भागा दूसरा भाई भी पकड़ाया, बोला बड़े भाई की गिरफ्तारी का इंतजार था

15 साल पहले हत्या के आरोप में हुई थी आजीवन कारवास की सजा

सागर। हत्या के आरोप में सजायाफ्ता एक कैदी 15 साल पहले पैरोल से भाग गया था। शुक्रवार को गोपालगंज पुलिस ने उसे शुक्रवारी क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया। फरार कैदी जाहिद खान (38) ईद मनाने के लिए अपने घर आया था। तभी सीनियर एसआई नीरज जैन और उनकी टीम ने उसे दबोच लिया। दोनों हाथों से आंशिक विकलांग यह कैदी साल 2011 में पैरोल पर गया था लेकिन अचानक भाग गया। जाहिद अपने बड़े भाई राशिद के साथ केंद्रीय जेल में हत्या के एक मामले में आजन्म कारावास की सजा काट रहा था। दिसंबर 2011 में जाहिद पैरोल पर था। इसी दौरान उसका भाई कैदी राशिद जिला अस्पताल से जेल प्रहरियों को चकमा देकर भाग गया। जैसे ही जाहिद को यह मालूम चला तो वह जेल नहीं लौटा। उसने पुलिस को बताया कि मैं, 10 साल से सरेंडर करना चाहता था लेकिन पहले मैं यह चाहता था कि राशिद पुलिस की गिरफ्त में आए। क्योंकि उसकी वजह से मुझे जेल जाना पड़ा। मेरी जिंदगी खराब हुई। अगर मैं सरेंडर कर देता तो राशिद कभी भी वापस नहीं आता। जाहिद, राशिद और उनकी बहन परवीन को साल 2009 में मकरोनिया थाना क्षेत्र (तत्कालीन पदमाकर नगर पुलिस चौकी) में हुई पूरन अहिरवार की हत्या के आरोप में आजीवन कारवास की सजा सुनाई गई थी। कुछ समय बाद परवीन को कोर्ट से जमानत मिल गई थी। यहां बता दें कि तीन दिन पहले ही गोपालगंज पुलिस ने जाहिद के बड़े भाई राशिद को जयपुर से पकड़ा था। पुलिस ने यह कार्रवाई मप्र हाईकोर्ट जबलपुर में दायर एक रिट-पिटीशन की सुनवाई के बाद मिले निर्देशों पर की।

मैंने सजा स्वीकार कर ली थी, भाई की हरकत से मन बदल गया

हत्या के इस मामले में स्वयं को बेगुनाह बताने वाले जाहिद का कहना था कि मुझे बचपन में बंदर ने काट लिया था। जिसके इन्फेक्शन के कारण मेरे दोनों हाथ की कलाई से पंजे तक विकृति आ गई। करीब 25 साल का हुआ तो इस मामले में फंस गया। जबकि मैं बिल्कुल बेगुनाह था। फिर भी मैंने कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को स्वीकार लिया। मेरे अच्छे व्यवहार व शारीरिक स्थिति को देखते हुए मुझे नियमित पैरोल मिलती रही। लेकिन इस बीच राशिद जेल से फरार हो गया। एकबारगी मेेरा मन हुआ मैं ईमानदारी से पैरोल पूरी कर जेल में दाखिल हो जाऊंगा। लेकिन फिर मुझे पुलिस और जेल स्टाफ का डर सताने लगा कि वे लोग मुझे राशिद का पता-ठिकाना जानने के लिए प्रताड़ित करेंगे। इसके चलते मैंने फरार होने में ही भलाई समझी। लेकिन जल्द ही मन ऊब गया और घर व शहर की याद सताने लगी। चूंकि राशिद को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था, इसलिए मैं सरेंडर को टालता रहा।

छिंदवाड़ा, बड़ौदा, जयपुर और अजमेर में काटी फरारी

जाहिद ने बताया कि फरार होने के बाद मैं सीधे छिंदवाड़ा पहुंचा। वहां मेरा एक अन्य परिचित कैदी रहता था। मैं वहां साल भर रहा। इसके बाद बड़ौदा, जयपुर समेत कई शहरों में गार्ड, मुनीम, चौकीदार का काम करता रहा। बाइक वगैरह भी खरीद ली। रायसेन के एक पते के जरिए जावेद के नाम से आधार कार्ड भी बनवा लिया। करीब साल भर पहले मेरा मन कुछ उजाट सा हुआ तो मैं अजमेर शरीफ की दरगाह पर सेवादार बन गया। वहीं मुझे राशिद के गिरफ्तार होने की खबर मिली और मैं सागर आ गया। जहां पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया।

सजा पूरी होने तक जेल से बाहर आना मुश्किल

जेल से फरार होने के मामले में अधिकतम दो साल के कारावास की सजा का प्रावधान है। जो कैदी को मूल सजा के अतिरिक्त भोगना होती है। इसके अलावा फरार कैदी को जेल से पैरोल व सजा कम करने के लिए विशेष अवसरों पर दी जाने वाली छुट्टियां भी शून्य कर दी जाती हैं। उदाहरण के लिए कैदियों को राष्ट्रीय पर्व व गांधी जयंती जैसे अवसरों पर उनकी सजा में से कुछ दिन माफ किए जाते हैं। जिससे सजा की अवधि से कुछ महीने या साल पहले उनकी जेल से रिहाई हो जाती है। जाहिद और राशिद के मामले में अब उन्हें पूरी सजा भोगना होगी। इसके पूर्व मेडिकल कारणों को छोड़ उनका जेल से बाहर आना लगभग नामुमकिन होगा।

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20/03/2026

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