आरोप: दिल्ली-भोपाल में “विक्टिम” बन घूम रहा रानू सिंघई मालथौन का जल्लाद है !

– स्थानीय नागरिकों समेत आदिवासियों ने गिनाए रानू सिंघई के कथित काले कारनामे
– बताया कैसे सूदखोर रानू ने आदिवासियों को बनाया बंधुआ और गौवंश को दी रूह कंपाने वाली यातना
सागरवाणी डेस्क। लोकतंत्र में जब कोई व्यक्ति कानून को अपनी जेब में रखने लगे, तो वह कितना खतरनाक हो सकता है, इसका जीता-जागता उदाहरण है मालथौन का रानू सिंघई। दशकों तक ‘मदर इंडिया’ के सुक्खी लाला की तरह गरीबों का खून चूसने वाले इस शख्स ने न केवल आदिवासियों की पुश्तैनी जमीनों को निगला, बल्कि धर्म, समाज और मानवीय संवेदनाओं को भी ताक पर रख दिया। ये आरोप मालथौन के उन आदिवासियों व स्थानीय लोगों से हुई चर्चा का सार हैं। जो इन दिनों स्थानीय निवासी फरार रानू सिंघई को सोशल मीडिया पर देख रहे हैं। चर्चा में बताया गया कि रानू सिंघई का साम्राज्य हम आदिवासियों की लाचारी और स्थानीय नागरिकों के भय पर पर खड़ा था। मालथौन के वार्ड-1 में रहने वाले हम लगभग 70 आदिवासी परिवारों के लिए रानू एक ऐसा अभिशाप था, जिससे निकलना नामुमकिन था। वह पहले शराब और चंद रुपयों का लालच देकर हम लोगों को कर्ज के जाल में फंसाता। इसके बदले वह हमारी जमीनों पर कब्जा कर लेता और हम लोगों को अपने ही खेत में ‘बंधुआ मजदूर’ की तरह इस्तेमाल करता। जब शोषण बर्दाश्त से बाहर हो जाता, तो हम लोग अपना घर-बार छोड़कर भाग जाते और रानू हमारी जमीन को पूरी तरह अपना बताकर नए शिकार तलाशता।
दयोदय गौशाला का जमीन पर भी षडयंत्र !
स्थानीय नागरिकों के मुताबिक, जैन समाज ने जब समाधिस्थ आचार्य विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा से दयोदय गौशाला के जरिए जीव-दया का संकल्प लिया, तो रानू सिंघई ने इसे अपनी अवैध सत्ता के लिए खतरा माना। जबकि समाज ने कलेक्टर से विधिवत अनुमति लेकर 5 एकड़ जमीन खरीदी, लेकिन रानू ने इसे नाकाम करने के लिए एक फर्जी दावेदार खड़ा कर दिया।
उसका मकसद मामले को वर्षों तक अदालतों में उलझाए रखना था ताकि गौशाला न बन सके। हालांकि, एसडीएम की नाप-जोख कर रानू के झूठ का पर्दाफाश कर दिया। यह साबित हो गया कि जिस जमीन पर रानू ‘ठेका’ बताकर खेती कर रहा था, वह दरअसल कब्जाई गई जमीन थी।
पशु क्रूरता : गौवंश के साथ खूनी खेल
स्थानीय निवासी मनोज के मुताबिक रानू सिंघई की क्रूरता सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं थी। वर्ष 2020 में उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। खेत में घुसने पर उसने बेजुबान गायों के पैर और सींगों को रस्सियों से इस कदर कसकर बांधा कि उनके अंगों से खून बहने लगा। उसने इन गायों को मरने के लिए खंती में फिंकवा दिया। जब गौरक्षकों और विहिप कार्यकर्ताओं ने उन्हें बचाया, तब पुलिस ने रानू पर पशु क्रूरता अधिनियम (429 भादवि) के तहत मामला दर्ज किया।
अहिरवार समाज के साथ 16.50 लाख की ‘महा-ठगी’
रानू की फितरत में सिर्फ कब्जा ही नहीं, बल्कि धोखाधड़ी भी शामिल थी। खुरई के सरजू अहिरवार ने अपनी छोटी सी पुश्तैनी जमीन बेचकर बच्चों के भविष्य के लिए नई जमीन खरीदने का सपना देखा था। रानू ने ‘आदिवासी की सस्ती जमीन’ दिलाने के नाम पर सरजू से किश्तों में 16 लाख 50 हजार रुपये ऐंठ लिए। आज वह परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहा है, क्योंकि रानू ने न जमीन दिलाई और न ही पैसे वापस किए। इसी मामले में रानू को 8 महीने जेल की हवा खानी पड़ी।
राजनैतिक संरक्षण और अपराध का लंबा इतिहास
रानू सिंघई का अपराध ग्राफ किसी पेशेवर अपराधी से कम नहीं है। उसके खिलाफ धोखाधड़ी, एससी-एसटी एक्ट, जान से मारने की धमकी, और अवैध हथियारों के साथ बलवा के प्रकरण दर्ज हैं। आरोप है कि 1998 से लेकर 2018 तक रानू को सत्ता का संरक्षण मिलता रहा। 2018 के चुनावों के दौरान तो उसने आदिवासियों को डरा-धमकाकर और मारपीट कर एक विशेष दल को वोट देने के लिए मजबूर किया, जिसके कारण उस पर गंभीर धाराओं में केस दर्ज हुआ। बहरहाल वर्तमान प्रशासन और स्थानीय विधायक की सक्रियता से अब रानू का तिलिस्म टूट रहा है। कलेक्टर के निर्देश पर तहसीलदार ने ऐतिहासिक आदेश पारित करते हुए 33 आदिवासी परिवारों को उनकी 98 एकड़ जमीन वापस दिलाई है। दशकों बाद मालथौन के आदिवासी अपने खेतों पर फिर से मालिक के हक से खड़े हैं। लोगों का कहना है कि रानू सिंघई अब जेल से बाहर आकर ‘विक्टिम’ बनने का नाटक कर रहा है और शासन- प्रशासन को दबाव में लेने की कोशिशों में जुटा है। जबकि मालथौन की जनता और पीड़ित समाज का दावा है कि अब हम लोग जागरूक हो गए हैं। अब ये लड़ाई सिर्फ एक अपराधी के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘सूदखोरी’ और ‘सामंतवाद’ के खिलाफ है जिसने हमें और मालथौन के विकास को वर्षों पीछे धकेल दिया था।
सागरवाणी….19/04/2026
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