चौपाल/चौराहा
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नारदवाणी: कहीं सियासी गलियारों में खाप पंचायत सा फरमान, तो कहीं ‘सम्मे साहब’ का सुल्तानी रुतबा!

1. कांग्रेस का ‘खाप पंचायत’ मॉडल: पुराने सेवादली को सरेआम माफी का फरमान

​सागर शहर कांग्रेस में इन दिनों डिक्टेटरशिप का नया दौर चल रहा है। भीतर बाजार के एक पुराने सेवादली को पार्टी के नए-नवेले संगठन प्रभारी ने ‘खाप पंचायत’ स्टाइल में सरेआम माफी मांगने का हुक्म सुनाया है। अपनी तोंद में कांग्रेस के जाने कितने राज दफन किए घूमने वाले इन प्रभारी जी का कहना है कि सेवादली को अगली मीटिंग में सबके सामने खड़े होकर तौबा करनी होगी। सेवादली का कसूर सिर्फ इतना कि उन्होंने कार्यकारिणी में सम्मान न मिलने पर सोशल मीडिया पर अपना दर्द बयां कर शहर अध्यक्ष को ‘मदारियों’ के इशारे पर नाचने वाला बता दिया था। चर्चा तो यह है कि इन बड़े पेट के प्रभारीजी को भी लोग उन्हीं मदारियों में से एक मानते हैं। अब देखना होगा कि पुराने सेवादली इस सिचुएशन को कैसे हैंडिल करते हैं।

​2. घुंघराले बालों वाले नेताजी का ‘ओवर-स्मार्ट’ गेम: जिलाध्यक्ष ने किया साइडलाइन

​जिला भाजपा के खेमे में ‘कर्ली हेयर’ वाले एक नौजवान के सितारे गर्दिश में नजर आ रहे हैं। पिछले सवा साल से सोशल मीडिया की कमान संभाले इस युवा की अपने बालों की तरह ‘घुमौवल’ फितरत अब जिलाध्यक्ष को रास नहीं आ रही। अध्यक्ष की नाराजगी की वजह इस युवा नेता की मल्टीटास्किंग आदत है; कभी किसी पूर्व मंत्री के दरबार में हाजिरी, तो कभी सांसद महोदय के यहाँ जी-हुजूरी। चर्चा तो यह भी है कि ट्रांसफर सीजन में अध्यक्ष जी की अनुशंसाओं का पर्सनल यूज भी जमकर किया गया है। नतीजा यह है कि अब इन ज्यादा ही सोशल हो रहे इस नौजवान को धीरे-धीरे साइडलाइन करने की प्लानिंग कर ली गई है।

3. ‘मिटने’ और ‘बनने’ का सियासी खेल: कांग्रेस और भाजपा का अनोखा विरोधाभास

​सागर के देहातों में पद से हटने को ‘मिटना’ कहते हैं। अब देखिए, कांग्रेस के शहर अध्यक्ष ने छह महीने के भीतर ही अपनी टीम सजाई लेकिन पार्टी आलाकमान ने 15 दिन में उसे जीरो यानी मिटा दिया। दूसरी तरफ भाजपा के जिलाध्यक्ष हैं, जो सवा साल बाद भी अपनी एग्जीक्यूटिव कमेटी का ‘मुहूर्त’ नहीं निकाल पाए हैं। इस सूरतेहाल पर चुटकी लेते हुए तमाशबीन कह रहे हैं— “एक वे हैं जो अपनी टीम बनाकर मिटवा भी आए, और एक आप हैं कि अब तक सिंगल ही घूम रहे हैं!” 

4. ‘सम्मे बड़े साहब’ का सुल्तानी रुतबा: पीआरओ की झिलाई या क्रेडिट की सुपारी?

​प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों क्रेडिट वॉर चल रहा है। जिला जनसंपर्क के प्रेस नोट्स पढ़कर ऐसा लगता है मानो जिले के ‘सम्मे बड़े साहब’ ही सुपरमैन हैं। खुरई-रहली को डॉक्टर मिले तो साहब की कोशिश, मनरेगा का टारगेट बढ़ा तो साहब का प्रयास! इन खबरों में स्थानीय विधायकों का नाम ऐसे नदारद है जैसे उनका इन उपलब्धियों में कोई रोल-पाठ ही न हो। अब यह पीआरओ की ओवर- झिलाई है या साहब को ऊपर से ही कोई ऐसी सुपारी मिली है कि सारा क्रेडिट खुद की जेब में ही रखना है ? साहब के इस एटीट्यूड ने राजनेताओं के बीच हलचल मचा दी है।

​5. खाकी की खामोशी और सिक्योरिटी एजेंसी अंडर ग्राउंड

​मोतीनगर क्षेत्र में हुई गोलीबारी और एक मासूम की मौत के बाद ‘आकाश-अमन सिक्योरिटी’ के गनमेन और उसका संचालक बड़ी सफाई से अंडरग्राउंड हो गया है। चर्चा है कि मोतीनगर पुलिस ने जमीनी कार्रवाई के बजाय फाइलों में ही लेफ्ट-राइट का खेल कर दिया है। लोग दबी जुबान में कह रहे हैं कि शायद एजेंसी संचालक ने पुलिस को मैनेज कर लिया है, तभी तो दफ्तर पर लटका ताला पुलिस की इन्वेस्टिगेशन पर तंज कस रहा है। यह सेट-अप आम जनता के बीच पुलिस की छवि पर सवालिया निशान लगा रहा है।

नारदवाणी डेस्क-9425172417

21/02/2026

 

 

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