जैन समुदाय का पत्र-कांड: हाईकोर्ट ने संदेही हिम्मू जैन के खिलाफ दर्ज याचिका खारिज की
बगैर पूर्व मंजूरी के के अभाव में अदालती कार्यवाही शून्य, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

जबलपुर। जैन समुदाय के चर्चित पत्रकांड मामले में हाईकोर्ट जबलपुर ने समुदाय के उस धड़े की याचिका खारिज कर दी है। जिसने इस पत्र-कांड के संदेही ललितपुर (यूपी) निवासी हिम्मू जैन के खिलाफ जिला एवं सत्र न्यायालय में दर्ज केस के खारिज होने के आदेश को चुनौती दी थी। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक निर्णय में व्यवस्था दी है कि यदि किसी विशेष अपराध के लिए कानूनन ‘पूर्व मंजूरी’ अनिवार्य है, तो उसके बगैर लिया गया अदालती संज्ञान पूरी तरह अवैध है। न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि बाद में मिली मंजूरी किसी भी ऐसी कार्यवाही को पुनर्जीवित नहीं कर सकती जो मूल रूप से अधिकार क्षेत्र के अभाव में शून्य थी। हालाँकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि मामले का अंत हो गया है। सक्षम प्राधिकारी, कानून के अनुसार और वैधानिक ढांचे के भीतर भविष्य में नए सिरे से आवश्यक कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं। इसका अर्थ है कि अब सही कानूनी प्रक्रिया (मंजूरी के साथ संज्ञान) का पालन कर मामला फिर से शुरू किया जा सकता है।
यह पूरे मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद सागर जिले के कोतवाली थाने में दर्ज एक प्राथमिकी से उत्पन्न हुआ था। याचिकाकर्ता संजय जैन ने प्रतिवादी के विरुद्ध धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप में धारा 295-A, 500, 501 और 502 IPC के तहत मामला दर्ज कराया था। पुलिस ने 14 फरवरी 2023 को आरोप पत्र दाखिल किया और ट्रायल कोर्ट ने अगले ही दिन संज्ञान ले लिया। चूंकि धारा 295-A के तहत मुकदमा चलाने के लिए Cr.P.C. की धारा 196 के तहत सरकार की पूर्व मंजूरी अनिवार्य है। इस मामले में, जब संज्ञान लिया गया तब कोई मंजूरी मौजूद नहीं थी; शासन ने यह मंजूरी महीनों बाद, 17 अगस्त 2023 को प्रदान की।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की सभी दलीलें खारिज की
न्यायालय ने याचिकाकर्ता की उन सभी दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि बाद में मिली मंजूरी ने दोष को ठीक कर दिया है। कोर्ट ने मुख्य बिंदु स्पष्ट किए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कम से कम मानहानि (धारा 500-502) के तहत कार्यवाही चलती रहनी चाहिए। कोर्ट ने इसे ठुकराते हुए कहा कि चूंकि पूरा मामला एक ही घटनाक्रम से जुड़ा है और मुख्य आरोप (धारा 295-A) का संज्ञान ही अवैध था, इसलिए पूरी कार्यवाही को ही रद्द करना सही है।कोर्ट ने भजन लाल बनाम हरियाणा राज्य मामले का जिक्र करते हुए कहा कि अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग स्पष्ट वैधानिक आदेशों को हराने के लिए नहीं किया जा सकता। मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही बंद करने से पहले याचिकाकर्ता को नहीं सुनना कोई त्रुटि नहीं थी, क्योंकि मजिस्ट्रेट केवल सत्र न्यायालय के आदेश का पालन कर रहे थे। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत और सत्र न्यायालय के उन आदेशों को बरकरार रखा जिनमें आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जोशी ने संजय जैन की याचिकाओं को खारिज करते हुए निष्कर्ष निकाला कि बिना मंजूरी के लिया गया संज्ञान शुरुआत से ही शून्य था।
05/02/2026



