
नारदवाणी
1. ‘पद्म’ सम्मान और कलयुगी श्रवण कुमार की ‘नौटंकी’ !
सागर के उस मिट्टी से जुड़े अखाड़ेबाज पहलवान को जैसे ही पद्मश्री सम्मान की घोषणा हुई, तो बरसों से “अदृश्य” रहे उनके कलाकार सुपुत्र की आंखों में ममता का सैलाब उमड़ पड़ा। जो बेटा कल तक पिता की खैरियत नहीं पूछ रहा था, वो अचानक पनीली आंखें लिए अपनी बहन के घर (जहां पिता शरण लिए हुए हैं) “बाबूजी-बाबूजी” करते पहुंच गया। मंशा साफ थी—सम्मान की चमक में अपनी दुकान चमकाना। पर पहलवान आखिर पहलवान ही थे! जैसे ही बेटे ने स्क्रिप्टेड डायलॉग चिपकाना शुरू किया, अखाड़ेबाज पिता ने तुरंत जुबानी हंटर चलाना शुरु कर दिए।। बुंदेली में ऐसी “उपाधियां” ( गाली) नवाजीं कि बेटे की सारी ओवर-एक्टिंग धरी की धरी रह गई। कड़वा सच तो यह है कि जब पहलवान गंभीर बीमार थे, तब सेवा सिर्फ बेटी ने की। अब जब दिल्ली से बुलावा आया, तो बेटे को पिता अचानक “तपस्वी- पुरुष” प्रतीत होने लगे।
2. अर्दली के बेटे ने ‘सेठानी’ की लॉबिंग को चटा दी धूल
शहर के एक अति-धनी परिवार की ‘सेठानी’ ने इस राष्ट्रीय सम्मान को पाने के लिए क्या नहीं किया? बंगले में वार-रूम, मय पुत्री नेताओं के आगे-पीछे होने से लेकर और लॉबिंग के तमाम ‘पेंतरे’ आज़मा लिए। बीच में खुद को साधारण आत्मा बताने इन सेठानी जी ने इम्पोर्टेड राजकुमारी संग किराये के गनमैन लेकर फुटबॉल- कबड्डी में भी शिरकत की। लेकिन किस्मत का खेल देखिए—सम्मान की रेस में उन्हीं के स्वर्गवासी अर्दली का बेटा बाजी मार ले गया। एक तरफ ‘नाजुक-नाजुक गुलाब’ तैयार करने वाली रईसी थी, तो दूसरी तरफ लाठी-तलवार घुमाकर शौर्य की गाथा लिखने वाला पसीना। चयन समिति ने ‘ड्राइंग रूम’ की सजावट के बजाय ‘अखाड़े’ की विरासत को चुना। यह जीत बताती है कि हुनर किसी की जागीर नहीं होता, चाहे आप कितने ही बड़े कुबेरपति क्यों न हों।
3. ‘दामिनी’ को तो इंसाफ मिल गया, पर माननीयों को कब
राजधानी के मीडिया का बस चले तो वह हर सुबह मध्य प्रदेश में नया मंत्रिमंडल शपथ दिलवा दे। इस “तारीख पे तारीख” के खेल से सागर के वरिष्ठतम विधायक समेत चार माननीय बुरी तरह त्रस्त हैं। समर्थक सुबह-शाम आरती की तरह एक ही सवाल पूछते हैं—”भैया, मंत्री कब बन रहे?” स्थिति यह है कि माननीय अब तक समर्थकों को इतनी तारीखें बांट चुके हैं कि कैलेंडर छोटा पड़ गया है। अब तो खीझ में वरिष्ठ विधायक जी ने साफ कह दिया है—”आगे से इस बारे में बात मत करना।” फिल्म ‘दामिनी’ में सन्नी देओल का डायलॉग तो सच हो गया, पर इन विधायकों के लिए इंसाफ की वो तारीख अभी भी फाइलों में दफन है।
4. ‘फर्जीवाड़े’ के प्रोड्यूसर-डायरेक्टर और विवादित शिक्षकों का नया ‘संघ’
विश्वविद्यालय के गलियारों में इन दिनों एक नए “शिक्षक संघ” की चर्चा है। पर्दे के पीछे इसके असली ‘प्रोड्यूसर’ एक भूमिहार अफसर हैं, जो पहले ही फर्जी नियुक्ति के केस में FIR झेल रहे हैं। कोर्ट की नौकरी का पुराना अनुभव रखने वाले इन साहब का मास्टर प्लान है—एक ऐसा संघ खड़ा करो जो यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय पर दबाव बना सके। मकसद नेक नहीं, बल्कि 2013 की उस विवादित भर्ती को बचाना है जो हाईकोर्ट की रडार पर है। “सागरवाणी” पहले ही बता चुका है कि इस संघ के सूरमा वही शिक्षक हैं जिनकी नौकरी पर बर्खास्तगी की तलवार लटकी है। देखना यह है कि कोर्ट के फाइनल फैसले के आगे यह दबाव की राजनीति कितनी टिकती है।
5. दो ‘पक्के दोस्तों’ की विदाई के लिए चुनाव आयोग की ‘अंतिम शरण’
जिले के प्रशासनिक मुखियों की कार्यप्रणाली से नेता, पत्रकार और जनप्रतिनिधि सभी ‘खफा-खफा’ से हैं। मुख्यमंत्री से लेकर प्रभारी मंत्री तक शिकायतें तो बहुत हुईं, पर इन दोनों “अधिकारियों की दोस्ती” इतनी गहरी है कि कुर्सी हिली तक नहीं। अब सागर के नाखुश गुट ने अपनी आखिरी उम्मीद ‘भारत निर्वाचन आयोग’ पर टिका दी है। इंतज़ार है 22 फरवरी का, जब मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन होगा। जैसे ही आयोग का डंडा चलेगा, ये “दोस्त” यहां-वहां होंगे और शहर के “नाखुश” लोग चैन की सांस लेंगे।
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