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लोकल एलिजाबेथ’ ने “लाल सलाम” छोड़ ओढ़ी भगवा चादर

  नारद वाणी

बीड़ी के धुएं में पद्मश्री का ख्वाब: शहर की ‘लोकल ऐलिजाबेथ’ ने “लाल सलाम” छोड़ ओढ़ी भगवा चादर

सागर। शहर के भद्रलोक में इन दिनों एक ‘स्वयंभू महारानी’ का जलवा है, जो खुद को सागर की ‘लोकल एलिजाबेथ’ तसव्वुर करती हैं। आत्ममुग्धता का आलम यह है कि गोया उन्होंने खुद ही अपने गले में पद्मश्री का मेडल डाल लिया हो। आजकल मजमा चाहे कबड्डी का हो या सियासत का, उम्र को धता बताकर वे हर जगह ‘चीफ गेस्ट’ बनकर नमूदार हो रही हैं। ऊपर से सोने पर सुहागा यह कि विदेश से एक ‘केयरटेकर’ राजकुमारी भी बुला ली गई है। अब दोनों के बीच सेल्फ-ऑबसेशन का ऐसा कॉम्पिटिशन चलता है कि खुदा की पनाह! ​हैरत होती है कि तमाम ‘धत्कर्मों’ के बाद शराफत का चोला पहनकर वे शहर में किस कॉन्फिडेंस के साथ गश्त कर रही हैं। वैसे सरकार ने अभी तक कोई ऑफिशियल अनाउंसमेंट नहीं किया है, मगर उनके सिर पर पद्मश्री का ‘भूत’ इस कदर सवार है कि उनकी वेशभूषा, बॉडी लैंग्वेज और आर्टिफिशियल विनम्रता सब कुछ बदल चुका है। ताज्जुब तो इस आडंबर के ‘अजर-अमर सोर्स’ पर होता है कि आखिर इतना ओवर-कॉन्फिडेंस कहां से आता कि बीड़ी के धुएं में भी पद्म अवार्ड की परछाई नजर आने लगे?​उनकी तथाकथित ‘सोशल सर्विस’ की हकीकत पूरा शहर दशकों से जानता है। चुनिंदा इदारा- सोसायटी को दस-बीस हजार का डोनेशन देकर ‘चीफ गेस्ट’ की कुर्सी हथियाना ही उनकी चैरिटी का बेस है। और यही डोनेशन बाद में इनकम टैक्स में छूट दिलाकर “आम के आम और गुठलियों के दाम” वाला हिसाब भी फिट कर देता है। ​बहरहाल, इन ‘सेल्फ-नॉमिनेटेड’ महारानी की इंसानियत का असली इम्तिहान तब हुआ जब योगाचार्य विष्णु आर्य, जिन्होंने उम्र भर उन्हें योग कराकर फिट रखा, एक एक्सीडेंट का शिकार होकर बिस्तर पर आ गए। शहर का हर नेता, जनप्रतिनिधि और समाजसेवी अस्पताल और उनके घर खैरियत पूछने पहुंचा, लेकिन हमारी इन ‘मैडम’ को अपने गुरु का हाल जानने की फुर्सत नहीं मिली। मुहतरम कबड्डी के मैदान में फोटो खिंचवाने तो पहुंच गईं, मगर योगाचार्य की चौखट पर इसलिए नहीं गईं क्योंकि कहीं ‘पद्म अवार्ड’ की रेस में वे उनसे कमतर न साबित हो जाएं। विडंबना देखिए, मैडम और उनकी राजकुमारी ने पूरी जिंदगी कांग्रेसी और वामपंथी ‘लाल सलाम’ के पालने में झूलते हुए गुजार दी, लेकिन अब लाइफ के आखिरी पड़ाव में अवार्ड की हसरत ने उन्हें ‘संघम शरणम् गच्छामि’ कहने पर मजबूर कर दिया है। सत्ताधीशों को गुमराह करने के लिए रातों-रात भगवा चादर तो ओढ़ ली गई है, मगर देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह चादर उनके ‘पंजे’ और ‘लाल सलाम’ वाले अतीत को छुपा पाएगी ?

क्या श्याम अपनी कार्यकारिणी राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद बनाएंगे ?

 श्याम तिवारी को तीन चौथाई जिले के भाजपा अध्यक्ष बने एक साल पूरा हो गया है। लेकिन वे अब तक जिला कार्यकारिणी गठित नहीं कर पाए। जबकि एक चौथाई से तनिक ज्यादा इलाके की जिलाध्यक्ष रानी कुशवाहा ये काम 6 महीने पहले सुलटा चुकी हैं। आज की तारीख में ये तय है कि श्याम बाबू अपनी कार्यकारिणी, राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद ही घोषित करेंगे। हो सकता है कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को भी पहले अपनी कार्यकारिणी गठित करने का अवसर दें। फिर अपने जिले के बारे में सोचें। क्योंकि इसी तरह के कयास प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के मनोनयन से पहले भी लगाए गए थे। कहा गया था कि प्रदेशाध्यक्ष तय होते ही जिला कार्यकारिणी घोषित हो जाएगी। खैर…. एक चर्चा ये भी है कि अध्यक्षी के शुरुआती दौर में तिवारी जी ने कार्यकारिणी के नामों का खाका प्रदेश आला कमान को मंजूरी के लिए भेजा था। लेकिन उनमें कइयों की पीठ पर बंगले की सील उछरी थी। इस बीच में शिकवे-शिकायत हुए। सब वहीं थम गया और श्याम भाई अभी भी इकंदर घूम रहे हैं।

मोतीनगर की आवेदन और FIR दोनों में मरण

ऐसा लगता है कि मोतीनगर पुलिस थाने को ” मूठ” मारी गई हो। क्यों यहां की पुलिस तत्काल कार्रवाई करती है सो फंसती है और आवेदन पर जांच कर कार्रवाई का निर्णय लेती है तब भी फंसती है। करीब 10 दिन पहले एक युवती के आवेदन पर एक युवक को बुलाकर पूछतांछ की तो उसने रेलवे स्टेशन स्थित एक लॉज में फांसी लगा ली। 4 दिन पहले एक अधेड़ महिला ने बेटे के दोस्त पर दुष्कृत्य का आरोप लगाया तो पुलिस ने पिछली घटना से सबक लेते हुए तत्काल FIR कर ली। लेकिन ये क्या इस आरोपी युवक ने भी 24 घंटे के भीतर बांदरी थाना क्षेत्र में फांसी लगा ली। इधर थाने के सूत्रों का कहना है कि ये स्थितियां टाली जा सकती थीं लेकिन कतिपय हेड कांस्टेबिल और उसके संगाती “आजई बनिया कालई सेठ” वाले फॉर्मूला पर चल रहे हैं। आदमी मरे या जिए…. टीआई की गादी बचे न बचे। अपन तो अपना हुनर दिखाएंगेई।

खुद निर्णय नहीं लोगे तो ऐसे ही ठांसे जाओगे

तीन बत्ती पर रोजाना 94 कम पूरे 100 कांग्रेसियों का जमा होते हैं। उन्हीं में से एक कांग्रेसी बड़े लाउडली बोल रहे थे कि जब महेश, खुद अपने पैरों पर खड़े नहीं होते हैं और निर्णय नहीं लेते हैं। वे यूं ही मौका- बे- मौका ठांसे जाते रहेंगे। इन कांग्रेसी का कहना था कि शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेश जाटव ने अपना एक और मेंटॉर माने सरपरस्त बना लिया। अब ये दोनों मेंटॉर जो बोल देते हैं, महेश वही करने निकल जाते हैं। उदाहरण के लिए विशुद्ध शहरी इलाके के अध्यक्ष महेश ने ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाली जी- रामजी योजना पर पत्रकार वार्ता कर डाली। योजना के बारे कोई खास जानकारी व तैयारी नहीं थी सो पत्रकारों के सवालों में घिर गए। बाजू में बैठे कांग्रेस के स्वयंभू पुराने “भोंपू ” उन्हें अपना अधकचरा ज्ञान देने की कोशिश भी की लेकिन तब तक महेश की तरी ही बाहर आ चुकी थी। चंद दिन पहले शहर अध्यक्ष महेश को एडिशनल एसपी ने भी लगभग ठांस ही दिया था। यहां भी वही कारण…. बगैर तैयारी के पुलिस पर आरोप जड़ दिए। चर्चा है कि महेश ने यह प्रदर्शन भी अपने मेंटॉरद्वय के सिंगल आदेश पर किया था।

क्या बिन सप्रे होना है बीना का उपचुनाव 

पालीटिकल पंडित बीना की फिजा बदलते देख रहे हैं। उनका मानना है कि बड़ी अदालत कभी भी अपना फैसला सुना कर बीना में चुनाव की राह सोमवार कर सकती है। अचानक भाजपा नेतृत्व ने अपनी सांगठनिक गतिविधियां बीना में बढ़ा दी हैं। मंत्रियों की आवाजाही भी बढ़ गई है। बीना की राजनीति तथा वहां की जनता में अपना जनाधार रखने वाले नेताओं की भी बीना में पूछ-परख बढ़ी है। स्थानीय और जिले की जनता में जिज्ञासा है कि आखिर ऊंट किस करवट बैठेगा। सूत्रों के अनुसार संगठन का आकलन है बीना बिना निर्मला के ही निर्मल हो सकता है। वहां यदि कमल खिलाना है तो केंडिडेट बदलना होगा। लेकिन ऐसे में पूछा जा सकता है कि क्या हुआ तेरा वादा !? तो भाई तथ्य यह है कि निर्मला जी बीना के विकास के मुद्दे को लेकर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आई थीं। बीना के विकास की ज्यादातर मांगें पूरी हो चुकी हैं। जो बड़ी मांगें हैं वे भी मिला जुला कर चुनाव की घोषणा के पहिले पूरी कर दी जाएंगी। यह सब देख समझ कर ही बीना के स्थानीय नेता अपनी गतिविधियां चला रहे हैं।

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