
सागर। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के कड़े रुख के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस ने सागर सहित छिंदवाड़ा, मऊगंज और झाबुआ की जिला शहर कांग्रेस कार्यकारिणी को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। सागर में गठित की गई 150 सदस्यीय ‘जंबो’ कार्यकारिणी को लेकर लंबे समय से विवाद की स्थिति बनी हुई थी। दिल्ली से आई फटकार के बाद प्रदेश संगठन ने यह बड़ा कदम उठाया है। एआईसीसी के इस निर्णय ने शहर अध्यक्ष महेश जाटव और उनके सर परस्तों के “सिलेक्शन” पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि महेश समेत प्रदेश के अन्य जिला- शहर अध्यक्षों की नियुक्ति के समय AICC ने बड़े स्पष्ट तौर पर कहा था कि आप सभी के 6 माह के कार्यकाल की समीक्षा की जाएगी। उसके बाद ही संगठन में उनके भविष्य का फैसला किया जाएगा। महेश व अन्य की नियुक्ति को फिलहाल 6 माह पूरे नहीं हुए हैं।
नियमों की अनदेखी और असंतुलन बना कारण
सूत्रों के अनुसार, एआईसीसी के स्पष्ट निर्देश थे कि बड़े जिलों में पदाधिकारियों की संख्या 51 और छोटे जिलों में 31 से अधिक नहीं होनी चाहिए। सागर में इस संख्या को तीन गुना तक बढ़ा दिया गया। इस कार्यकारिणी में न केवल संख्या बल का उल्लंघन हुआ, बल्कि सामाजिक समीकरणों को भी पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। सागर विधानसभा की जमीनी हकीकत के विपरीत, एक समुदाय विशेष के लगभग दो दर्जन लोगों को पदों से नवाज दिया गया, जिनमें से कई वर्षों से संगठन में निष्क्रिय थे। जबकि इस समुदाय के वोटर्स की संख्या सागर विस क्षेत्र में 20 हजार भी नहीं है। ऐसा लगा कि शहर कांग्रेस इस वर्ग विशेष के वोट सुरक्षित करने के बजाय बहुसंख्यकों को भाजपा के लिए ग्लोबलाइज होने का अवसर ज्यादा दे रही हो। इसके अलावा कार्यकारिणी में पिछड़ा वर्ग (OBC) की उपेक्षा और कुछ विवादित चेहरों को विशेष प्राथमिकता देने से समर्पित कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष था। पूर्व अध्यक्ष रहे राजकुमार पचौरी और जगदीश यादव जो क्रमशः पूर्व प्रदेश आला कमान कमलनाथ और अरुण यादव के करीबी माने जाते हैं। उनके समर्थकों को कार्यकारिणी में विशेष तरजीह नहीं दी गई। यहां तक कि महापौर व विधायक का चुनाव लड़े निधि सुनील जैन, ओबीसी से आने वाले एक कार्यकर्ता को ब्लॉक अध्यक्ष बनाने की मंशा शहर अध्यक्ष महेश जाटव के सामने जता चुके थे। लेकिन उनकी इस मांग को भी दरकिनार कर दिया गया। 
गठन होते ही विवाद और इस्तीफों का दौर
सूची जारी होने के बाद से ही कांग्रेस के भीतर अंतर्कलह खुलकर सामने आ गई थी। जहाँ एक वरिष्ठ पदाधिकारी रशीद राईन ने डिमोशन से नाराज होकर इस्तीफा दे दिया, वहीं सेवादल के पूर्व अध्यक्ष विजय साहू ने सोशल मीडिया पर जमकर अपना गुस्सा जाहिर किया था। कार्यकर्ताओं का आरोप था कि कार्यकारिणी का गठन जमीनी पकड़ के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर किया गया था।
भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव: एक विश्लेषण
इस निर्णय का आगामी समय में संगठन पर व्यापक असर पड़ेगा। कार्यकारिणी शून्य करने के इस फैसले की आंच हाल ही में नियुक्त किए गए संगठन मंत्रियों, आशीष ज्योतिषी और रामकुमार पचौरी पर भी पड़ सकती है। इससे संगठन में अनुशासन का एक कड़ा संदेश जाएगा।अब नए सिरे से होने वाले गठन में ‘केवल नाम’ वाले नेताओं की छंटनी होगी। इससे उन कार्यकर्ताओं को अवसर मिलेगा जो जमीन पर रहकर पार्टी के लिए संघर्ष करते हैं।आने वाले समय में पार्टी को ओबीसी, एससी और अन्य वर्गों के बीच उचित तालमेल बैठाना होगा। यदि आगामी चुनाव से पहले एक संतुलित और ऊर्जावान टीम खड़ी नहीं की गई, तो पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस कठोर निर्णय से यह साफ हो गया है कि आलाकमान अब स्थानीय गुटबाजी और मनमर्जी को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
13/02/2026



