टाईगर रिजर्व में ‘डिजिटल पहरेदारी’ फेल: 48 घंटे तक बाघ के शव के पास बजती रही बीप, सोता रहा प्रशासन !
समय रहते अलर्ट पर ध्यान देते तो बाघ के प्राण बचा भी सकते थे

सागर। मध्यप्रदेश के नवनिर्मित वीरांगना दुर्गावती टाईगर रिजर्व (वीआरडीटीआर) में महीने भर पहले आए बाघ की मौत ने यहां के प्रबंधन के दावों की पोल खोल दी है। असल में मुहली परिक्षेत्र के मानेगांव बीट (कक्ष क्रमांक 159) में 15 फरवरी 2026 की शाम एक बाघ का शव बरामद हुआ। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस बाघ की सुरक्षा के लिए उसके गले में लाखों रुपये का ‘रेडियो कॉलर’ बांधा गया था, वही कॉलर दो दिनों तक रिजर्व प्रबंधन व अन्य ‘मौत का सिग्नल’ ( मोर्टलिटी अलर्ट) भेजता रहा, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सोए रहे। जब उसका शव मिला तो यह बयान जारी कर चुप्पी साध ली कि टेरोटोरियल फाइट में इस बाघ मौत हुई है। एक तरह से ये जताने की कोशिश की कि, बाघ का शिकार नहीं हुआ। उसकी परिस्थितिजन्य मौत हुई। जबकि इस पूरे मामले का तकनीकी आधार पर विश्लेषण करें तो बाघ की मौत में वीडीटीआर की लापरवाही भी कम नहीं रही।
तकनीकी सुराग बनाम प्रशासनिक लापरवाही
रेडियो कॉलर तकनीक के अनुसार, इसमें लगा मॉर्टलिटी सेंसर तब सक्रिय होता है जब जानवर एक निश्चित समय (आमतौर पर 4 से 8 घंटे) तक कोई हलचल नहीं करता। इस मामले में बाघ को अभी एक महीना पहले (18-19 जनवरी 2026) ही कॉलर पहनाकर रिजर्व में छोड़ा गया था। प्रोटोकॉल के मुताबिक, यदि 6 घंटे तक बाघ की गर्दन में हलचल न हो, तो सिस्टम को तुरंत कंट्रोल रूम, ईमेल और एसएमएस के जरिए अलर्ट भेज देना चाहिए।वीआरडीटीआर में यह ‘स्टैटिक अलर्ट’ (स्थिरता का संकेत) लगातार दो दिनों तक मिलता रहा ! जिसका सीधा अर्थ था कि बाघ या तो गंभीर घायल है या मृत। इसके बावजूद, फील्ड स्टाफ और तकनीकी टीम इसे ‘बाघ का आराम करना’ समझकर नजरअंदाज करती रही। यह न केवल फील्ड स्टाफ की जिम्मेदारी पर सवाल है, बल्कि भारतीय वन्यजीव संस्थान और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की मॉनिटरिंग डेस्क की भी बड़ी चूक है। अगर समय रहते बाघ के हलचल नहीं करने के अलर्ट पर गौर कर लिया जाता तो मुमकिन है कि वह घायलावस्था में मिल जाता और उपचार कर उसके प्राण बचाए जा सकते थे।
पीसीसीएफ की चेतावनी के बाद भी नहीं जागा अमला
हाल ही में मध्य प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वी.एन. अम्बाडे द्वारा जारी एक कड़े पत्र में प्रदेश में बढ़ती बाघों की मृत्यु पर चिंता जताई गई थी। पत्र में स्पष्ट कहा गया था कि बाघों के आपसी संघर्ष के दौरान होने वाली दहाड़ें दूर-दूर तक सुनाई देती हैं, ऐसे में स्थानीय अमले को घटना की भनक न लगना ‘सुरक्षा व्यवस्था के सुदृढ़ न होने’ का प्रमाण है। पेंच और सतपुड़ा के बाद अब दुर्गावती टाइगर रिजर्व में भी वही कहानी दोहराई गई है—जहाँ तकनीक चीखती रही, लेकिन इंसान खामोश रहे। 
वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट ने कहा जवाबदेही तय हो
प्रसिद्ध वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने इस पूरी घटना को ‘मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल की सामूहिक विफलता’ करार दिया है। उन्होंने इस मामले में कई गंभीर प्रश्न खड़े किए है। दुबे का कहना है कि जब रेडियो कॉलर हर 8 घंटे में ‘स्टैटिक’ अलर्ट दे रहा था, तो 48 घंटों तक उसे क्यों दबाया गया? अगर बाघों के बीच टेरिटोरियल फाइट (क्षेत्रीय संघर्ष) हुई, तो उसकी आवाज और हलचल से मॉनिटरिंग दल बेखबर कैसे रहा? दुबे ने इस अक्षम्य लापरवाही के लिए जिम्मेदार स्टाफ को तत्काल निलंबित कर उच्च स्तरीय जांच बैठाने की मांग की है। इस पूरे मामले को लेकर वी आरडीटीआर के डिप्टी डायरेक्टर रजनीशकुमार सिंह से जानकारी लेना चाही लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुआ।
लाखों की तकनीक, शून्य परिणाम
वन्य प्राणी विशेषज्ञों के अनुसार, एक आधुनिक सैटेलाइट कॉलर की कीमत 3 रु.लाख से 4.5 लाख रु.तक होती है। यह तकनीक इसलिए अपनाई गई थी ताकि बाघों की रीयल-टाइम लोकेशन और उनके जीवन के संकेतों पर नजर रखी जा सके। लेकिन वीडीटीआर की इस घटना ने सिद्ध कर दिया है कि जब तक मैदानी अमला और निगरानी करने वाले संस्थान मुस्तैद नहीं होंगे, तब तक यह महंगी तकनीक केवल एक ‘महंगा खिलौना’ बनकर रह जाएगी।
-9425172417



