विविधा

कोचिंग और कैरियर वाला कोटा सिस्टम

एक नये तरह का “कोटा सिस्टम” पनप गया है। इसे ‘कोटा कोचिंग कुचक्र’ भी कह सकते हैं। इसमें फंसे स्टूडेंट्स अपने मां बाप की पीढियों की कमाई को प्याज के छिलकों की तरह उतरते देखते रहते हैं। वहां शिक्षा व्यवस्था के कसाई बैठे हैं छुरियां लेकर। बच्चे को बताते नहीं कि बेटा तू लौट जा तू डिलीवर नहीं कर पाएगा। प्रोत्साहन भी नहीं देते कि चल अपन सब मिलकर कोशिश करते हैं, तेरे से होगा तो होगा, नहीं होगा तो इतने सारे विकल्प और हैं दुनिया में। डरा के रखते हैं, नोटों की झपटमारी के लिए सख्त अनुशासन और टाइट शैड्यूल।एक सैकंड भी खुद के भीतर झांकने को वक्त नहीं। ऐसे वक्त जब बढ़ते बच्चे को पोषण चाहिए वह मां बाप से दूर शोषण की दुनिया में भेज दिया जाता है।

…कुछ बच्चे शुरुआत में ही मां बाप को हकीकत बताने की कोशिश भी करते हैं तो महत्वाकांक्षी मां बाप उसे इस परतंत्रता के दलदल की ओर जबरन ठेल देते हैं कि….साले हम लोग रूपया भेजने में कोताही नहीं कर रहे, तू पढ़ने से जी चुरा रहा है।…बहुतेरे किशोरों को लगता है कि साला इस लिए पैदा हुए थे। यकीनन उनमें से बहुतों को पता होता है कि वे डिलीवर नहीं कर पाएंगे। लेकिन मां बाप सुनने को तैयार नहीं, कोचिंग संचालकों को रूपया खींचने से गुरेज नहीं। ऐसे में बाप को सेमेस्टर फीस के लिए कर्ज उठाते, जमीन बेचते और गिड़गिड़ाते देखने के मंजर जो गिल्टी क्रिएट करते हैं उस सारे सिनारियो का मिलाजुला परिणाम होता है पंखे से लटकी एक अदद लाश।

…कोटा वालों के लिए यह महज एक संख्या भर है कि इस महीने खुदकुशी करने वाले बच्चों का टोटल स्कोर क्या रहा। लेकिन हर लटकती और झाग छोड़ती लाश असल में उस के परिवार को हत्यारा बना जाती है। जिंदगी भर बाप सोचता है मैं पूर्ति नहीं कर सका, मां सोचती है ठीक से पाल न सकी मैं, भाई बहिन सोचते हैं कि हम बात करके समझा सकते थे मौका ही नहीं मिला। …इन सबको लाश के साथ एक चिट्ठी मिलती है। उससे ही खुलासा होता है कि मरने वाला बेटा बेटी खुद तो तकलीफ सह ही रहा था लेकिन उससे मां बाप की परेशानी देखी नहीं जा रही थी। …कितना प्यार होता है परिवारों में इसका सबसे पुख्ता दस्तावेज होता है स्युसाइड नोट। बस ऐसा ही एक और स्युसाइड छोड़ गया है सागर का मनीष पटेल। यदि कोई समझने को तैयार हो तो यह स्युसाइड नोट मनीष ने सिर्फ अपने मां बाप और बहिन के लिए नहीं लिखा है, यह आपके लिए भी है।

…और इस पूरे आत्मघाती सिलसिले में सरकार कहां है। है, बिल्कुल है। पंचनामा करके लाश को जल्दी पोस्टमार्टम करके वापस देने के लिए जो रूपये मांगती है वह है सरकार, सार्टिफिकेट्स और लोन के फार्म भरवा रही है वह है सरकार, फीस के लिए जमीन की गिरवी और रजिस्ट्री करा रही थी वह भी सरकार ही है, कोचिंग वालों से रिश्वतें ले रही है वही सरकार है। बच्चों को अंधी होड़ में हांके हुए है वह भी सरकार ही है।

मनीष ने लिखा है कि मां दो साल पहले कोटा पहुंचते ही मैं मरने वाला था , एक फोनकाल ने मुझे बचा लिया था। कल भी मनीष बच जाता यदि प्राइवेट मेडिकल कालेज वाले फोन पर बता देते कि जो एक लाख रु सिर्फ च्वाइस फिल करने के पहले जमा कराए जा रहे हैं, यदि थर्ड कौंसिलिंग में सरकारी कालेज उसे मिल जाता है तो क्या वे रुपये वापस मिल जाएंगे या नहीं।…उसे जवाब नहीं मिला। इस लुटेरी दुनिया से लड़ते रहने की हिम्मत जबाब दे गई। नतीजा एक और स्युसाइड नोट! पढ़िए… पढ़ते रहिए

रजनीश जैन
सागर

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