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आडिटोरियम के हितलड़े

शनीचरी की बंगला स्कूल जब टूट रही थी तब आप सब कहां थे ? कब से डा. गौर की धरोहरों की चिंता उमड़ पड़ी आप लोगों के दिलों में? आप लोग कहां थे जब हरिसिंह गौर की पैदाइश और बचपन की गोद बने उनके पुश्तैनी मकान को तोड़ा जा रहा था एक बदसूरत सी बिल्डिंग बनाने को। वह खपरैली इमारत जो हर सागरवासी के लिए गांधी के आश्रम साबरमती जैसा महत्व रखती थी। जिसमें डा. गौर ने जीवन मरण, मौत मिट्टी, पठन पाठन, तीज त्यौहार ,मिलन विछोह सब देखे थे। जिसमें अभी डेढ़ दो दशक पहले तक सरकारी प्रायमरी स्कूल के बच्चे पढ़ा करते थे। इस स्कूल को उसकी इमारत समेत नष्ट करते वक्त तुम सब कहां थे!? उसकी जगह जो इमारत अब बनी है ,बताओ तुम सब कि 26 नवंबर के बाद क्या झांकने गये हो उस कांक्रीट के ताबूत में ?

तुम लोग वही हो न जो डा. गौर की वसीयत सुरक्षित न रख सके। उनके स्मारक ग्रंथ सुरक्षित न रख सके, पांडुलिपियां न जुटा सके, उनके आडियो न जुटा सके, उनकी बेटियों की मौत मिट्टी में न जा सके, उन्हें विश्वविद्यालय में कभी बुला न सके।

तुम लोगों को उस आडिटोरियम के गिरने पर कष्ट हो रहा है जिसे डा. गौर ने कभी देखा तक नहीं। मकरोनिया की ओल्ड साइट से आए सामान से वह बना था , लेकिन ओल्ड साइट पर आज भी बनी उन इमारतों और बैरकों के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है जिनमें 1946 में विश्वविद्यालय की कक्षाएं शुरू हुई थीं। वहां तो डा. गौर खुद भी लेक्चर लेते रहे होंगे, प्रशासनिक काम करते रहे होंगे। कभी गये वहां की सुध लेने। पहाड़ी पर डा. गौर की चरोखर जीम रहे तुम लोगों से तो अच्छे ओशो रजनीश के शिष्य हैं जो उस ओल्ड साइट को देखने विदेशों से आते हैं। जैसा बोर्ड रजनीश की विरासत पर लगा है तुम लोगों ने लगाने की कोशिश की है कभी कि यही वह ओल्डसाइट है जहां गौर ने अपनी मेहनत की कमाई से सागर में यूनिवर्सिटी की शुरुआत की थी।…सोचो …जिसने यूनिवर्सिटी बनाई उसके लिए एक अक्षर तक नहीं लिखा और उस यूनिवर्सिटी में पढ़ने आए छात्र रजनीश का स्मारक बना हुआ है वहां। विश्वविद्यालय के बुद्दिजीवियो तुम से अच्छे मकरोनिया के दलित संतोष रोहित और सुशीला रोहित हैं जिन्होंने मकरोनिया बटालियन गेट पर डा. गौर की प्रतिमा बनाई, पर डा. गौर की विरासत पर 70 साल से कुंडली मार कर बैठे ,हर महीने करोड़ों डकार रहे बुद्दिजीवियों ने ओल्ड साइट के लिए क्या किया?

 

मुझे 13 अप्रैल को किसी ने डाक से गुमनाम चिट्ठी भेज कर आडिटोरियम टूटने पर कुछ करने को कहा था। …और मैं तभी से इंतजार कर रहा था कि इस आडिटोरियम के टूटने में विलंब क्यों हो रहा है। तुम लोग स्मृतियां संजोने के काबिल हो ही नहीं क्योंकि तुम्हें स्मृतियों का महत्व और उनकी पहचान करना नहीं आती। तुम लोगों को जो आता है वो करो, जिसमें कि तुम पारंगत हो।…रिटायर होने लगो तो एक्सटेंशन की फाइलें पहले से घुमाने लगो। कुलपति की चिरौरियां करो। इंदिरा राजीव की जय जय करते नौकरियाँ ली थीं, अब एक्सटेंशन के लिए नागपुर की चड्डियां धोओ। पत्रकारिता विभाग में बीते महीने की आखिरी तारीख को जो हुआ उसमें तुम्हें गौर की छटपटाती आत्मा नजर नहीं आती! विश्वविद्यालय की पहाड़ी पर धृतराष्ट्रों की तरह अपनी आंखों के सामने होता द्रौपदी का चीरहरण दिखता नहीं है,…आडिटोरियम की चद्दरें और एंगिलें बचाने हम लोग शहर से आएं। गज़ब के खुदगर्ज हो तुम लोग।


रजनीश जैन
सागर

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