मोतीनगर थाना क्षेत्र से युवक का अपहरण करने वाले दो अभियुक्तों को सजा, पांच बरी
सुबेदार वार्ड में ढाई साल पहले हुई थी घटना, फायरिंग भी की थी मुख्य आरोपी अब तक फरार

सागर। जिला एवं सत्र न्यायालय, सागर के पंचम अपर सत्र न्यायाधीश सुधांशु सक्सेना की अदालत ने शहर के चर्चित संस्कार उर्फ अर्चित साहू अपहरण कांड में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले के मुख्य आरोपियों वासु अहिरवार, शैलेंद्र श्रीवास्तव को अपहरण, फिरौती और कूटरचना (फोर्जरी) का दोषी करार दिया है। वहीं, साक्ष्यों के अभाव में पांच अन्य आरोपियों—अजय तिवारी, मिंटू उर्फ सोमेश, रविंद्र पटेरिया, उपेंद्र पटेल और वासु सोनी को दोषमुक्त कर दिया गया है। घटनाक्रम का मुख्य आरोपी मनु उर्फ मयंक सोनी अभी भी फरार है।
घर से अपहरण, फोन- पे पर वसूली थी फिरौती
अभियोजन के अनुसार, घटना 24 जून 2023 की रात करीब 9:30 बजे की है, जब मोतीनगर थाना क्षेत्र के सूबेदार वार्ड में फरियादी आशीष साहू का पुत्र संस्कार अपने दोस्त के साथ घर के बाहर बैठा था। इसी दौरान सफेद रंग की अर्टिगा कार में आए नकाबपोश बदमाशों ने जबरन संस्कार का अपहरण कर लिया। अपहरणकर्ताओं ने बालक के मोबाइल से ही उसके पिता को फोन कर दो लाख रुपये की फिरौती मांगी और पैसे न देने पर जान से मारने की धमकी दी। डर के मारे फरियादी ने आरोपियों द्वारा बताए गए तरीके से एक लाख रुपये ‘फोन-पे’ के माध्यम से ट्रांसफर कर दिए। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए विवेचना शुरू की और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों तक पहुँची। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने पुलिस को चकमा देने के लिए अर्टिगा कार (MP 04 CQ 8720) पर फर्जी नंबर प्लेट (MP 09 QB 4575) का इस्तेमाल किया था। पुलिस ने घेराबंदी कर अपहृत बालक को सकुशल बरामद किया और आरोपियों के कब्जे से फिरौती की रकम, वारदात में प्रयुक्त हथियार (देशी कट्टा व कारतूस) और कार बरामद की।
जीपीएस लोकेशन और मोबाइल रिकॉर्ड बना अहम सुबूत
न्यायालय ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों, विशेषकर जीपीएस लोकेशन और मोबाइल कॉल रिकॉर्ड्स के आधार पर वासु अहिरवार, शैलेंद्र और मनु सोनी को धारा 364-ए (फिरौती के लिए अपहरण), 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र), और 468, 471 (दस्तावेजों की कूटरचना) के तहत दोषी माना। अदालत ने टिप्पणी की कि फिरौती के लिए अपहरण एक गंभीर अपराध है जो समाज में असुरक्षा की भावना पैदा करता है।
पुलिस की लचर जांच के कारण बाकी आरोपियों को मिला लाभ!
शहर के इस चर्चित अपहरण कांड में न्यायालय का फैसला पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा किया है। यद्यपि न्यायालय ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराया है, लेकिन आठ में से पांच आरोपियों का साक्ष्यों के अभाव में बरी होना पुलिस की ‘कमजोर विवेचना’ की कहानी खुद बयां कर रहा है। अदालत का 64 पेज का विस्तृत फैसला बताता है पुलिस ने जल्दबाजी में गिरफ्तारी तो की, लेकिन उन आरोपियों के विरुद्ध ठोस कानूनी सबूत में इकट्ठा करने में नाकाम रही।
अधूरी पहचान परेड और साक्ष्यों का अभाव
पुलिस की सबसे बड़ी विफलता आरोपियों की शिनाख्त और घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने में रही। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय मौके पर मौजूद सभी आरोपी वास्तव में कौन थे। विवेचना के दौरान पुलिस ने मोबाइल लोकेशन और सीडीआर को मुख्य आधार बनाया था। हालांकि, न्यायालय में यह साबित नहीं हो सका कि जिन नंबरों से फिरौती मांगी गई या जो नंबर साजिश में प्रयुक्त बताए गए, वे सभी पांच बरी किए गए आरोपियों के स्वामित्व में थे पुलिस ने जब्त मोबाइल और सिम कार्ड्स के पंचनामा और प्रक्रिया में भी कानूनी बारीकियों की अनदेखी की गई, जिसका सीधा फायदा आरोपियों को मिला।

आपराधिक षड्यंत्र साबित करने में भी चूके
धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत पुलिस यह स्थापित करने में नाकाम रही कि बरी हुए पांचों आरोपी अपहरण की योजना बनाने में किस प्रकार शामिल थे। केवल किसी के साथ कार में बैठे होने या परिचित होने मात्र से उसे अपहरणकर्ता नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसका सक्रिय योगदान सिद्ध न हो। पुलिस की केस डायरी में ऐसे “स्वतंत्र गवाहों” की कमी रही जो घटना के पूर्व या पश्चात इन आरोपियों की संदिग्ध गतिविधियों की पुष्टि कर सकें। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि मुख्य आरोपी मनु उर्फ मयंक सोनी पूरी सुनवाई के दौरान फरार रहा। मुख्य आरोपी का लंबे समय तक गायब रहना और उसे गिरफ्तार न कर पाना, पुलिस के सूचना तंत्र की विफलता को दर्शाता है।
18/01/2026



