लोकायुक्त संगठन रिश्वतखोरी के झूठे मामले में बैंक मैनेजर को फंसा रहा था!
मामला ये है कि विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, सागर के एक फैसले के अनुसार लोकायुक्त संगठन की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है। यह संगठन भी किसी निर्दोष को फंसाने के लिए पुलिस की तरह झूठी कहानी और साक्ष्य तक गढ़ सकता है। खुरई के एक सरकारी बैंक मैनेजर और चपरासी के करीब 5 साल पुराने ट्रेप को लेकर आए इस फैसले का सारांश पढ़ेंगे तो शायद यकीन आ जाए। जिसमें कैसे एक शिकायतकर्ता ने झूठी जानकारी देकर लोकायुक्त पुलिस का उपयोग किया और फिर यह विशेष पुलिस कैसे उसके झूठ को सच बनाने में जुट गई ?

सक्रिय पत्रकारिता में एक संकल्प सा दिला दिया जाता है कि आपराधिक मामलों में बरी होने वालों की खबर नहीं करना है। इससे समाज में अपराधों के प्रति भय कम होता है। कुछ हद तक यह सही भी है लेकिन जब मामला, किसी निर्दोष को फंसाने कानून के रक्षकों के अपराधियों की तरह व्यवहार करने का सच सामने आता है। तब ये संकल्प तोड़ना पड़ता है…..। बहरहाल मामला ये है कि विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, सागर के एक फैसले के अनुसार लोकायुक्त संगठन की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है। यह संगठन भी किसी निर्दोष को फंसाने के लिए पुलिस की तरह झूठी कहानी और साक्ष्य तक गढ़ सकता है। खुरई के एक सरकारी बैंक मैनेजर और चपरासी के करीब 5 साल पुराने ट्रेप को लेकर आए इस फैसले का सारांश पढ़ेंगे तो शायद यकीन आ जाए। जिसमें कैसे एक शिकायतकर्ता ने झूठी जानकारी देकर लोकायुक्त पुलिस का उपयोग किया और फिर यह विशेष पुलिस कैसे उसके झूठ को सच बनाने में जुट गई।
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सागर। विशेष न्यायाधीश भ्रष्टïचार निवारण अधिनियम आलोक मिश्रा ने रिश्वतखोरी के एक मामले में बैंक मैनेजर व उनके प्यून को बरी किया है। न्यायाधीश श्री मिश्रा ने इस मामले को झूठा पाते हुए शिकायतकर्ता और विवेचनाधिकारी के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की बात कही है। इस केस में बचाव पक्ष की ओर से पैरवी एड. विजय धाकड़ और केपी दुबे ने की। घटनाक्रम यूं है कि सितंबर 2019 में लोकायुक्त पुलिस की टीम ने बैंक ऑफ बड़ौदा की खुरई शाखा में पदस्थ मैनेजर जीतेंद्र श्रीवास और भृत्य निखिल यादव को 20 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था। इन दोनों के खिलाफ शिकायत खुरई निवासी एक युवक मयंक जैन निवासी खुरई ने की थी। उसका आरोप था कि बहन प्राची जैन के नाम से लिए जा रहे एक बिजनेस लोन(9,90,000रु.) की एवज में मैनेजर ने 10 प्रतिशत राशि बतौर रिश्वत मांगी थी। इसी तारतम्य में यह राशि दी गई।
20 हजार रुपए की रिश्वत लेने का दावा किया था
रिश्वत मांगने की शिकायत मयंक ने लोकायुक्त ऑफिस सागर में की थी। जिसके बाद उसे एक वॉयस रिकॉर्डर दिया गया। जिसमें दोनों की बातचीत रिकॉर्ड हो गई। इसके बाद लोकायुक्त के एक ट्रेप दल ने 17 सितंबर 2019 को बैंक पहुंचकर मैनेजर श्रीवास व प्यून यादव को20 हजार रु. की रिश्वत लेते ट्रेप कर लिया। हाथ धुलवाने पर दोनों आरोपियों के हाथ मामूली रंग से गुलाबी हो गए। लोकायुक्त पुलिस ने इस कार्रवाई के आधार पर चालान पेश किया और दावा किया बैंक मैनेजर और प्यून शिकायतकर्ता से 20 हजार रुपए की रिश्वत मांग रहे थे।
लोन की किस्त को रिश्वत की राशि बना दिया
दोनों आरोपियों के बचाव में उनके वकीलों ने जोरदार तर्क दिए। सबसे पहले तो वकीलों ने ये साबित किया कि अभियोजन पक्ष 20 हजार रु. की जिस राशि को रिश्वत बता रहा है। उसका भ्रष्टाचार से कोई लेन-देन नहीं है। इसकी पुष्टि शिकायतकर्ता जैन के इसी बैंक के एक लोन खाते से होती है। जो एनपीए हो चुका था। जैन को बैंक का 6.85 लाख रु. लौटाना था। इस राशि की रिकवरी के लिए बैंक की एक टीम अक्सर, मयंक जैन के घर पहुंच जाती थी। इससे मयंक की बेइज्जती के साथ-साथ मां-बाप भी नाराज होते थे। मयंक ने अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए ही बैंक मैनेजर को झूठे आरोप में ट्रेप कराया।
ऑडियो में कहीं पर भी रिश्वत मांगने की पुष्टि नहीं
बचाव पक्ष ने सबसे पहले अभियोजन द्वारा साक्ष्य के रूप में पेश किए गए ऑडियो टेप पर तर्क-वितर्क किए। वकीलों ने कहा कि, उक्त ऑडियो में कहीं पर भी बैंक मैनेजर श्रीवास, रिश्वत की मांग करते नहीं दिख रहे। उलटा वे आवेदक मयंक जैन से बकाया लोन जमा करने की बात कह रहे हैं। मयंक भी उनसे बोल रहा है कि आप वसूली के लिए किसी को घर पर मत भेजा करो। मम्मी-पापा नाराज होते हैं। मैनेजर ने चर्चा के दौरान बकाया लोन की राशि का भी जिक्र किया। क्रास के दौरान शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि यह सारी बातचीत पुराने लोन के संबंध में थी। इसमें रिश्वत की बात कहीं पर भी नहीं हुई।
फाइनल ऑडियो-वीडियो और दोस्त की हरकत से राजफाश !
बचाव पक्ष ने विचारण के दौरान न्यायालय से कहा कि लोकायुक्त पुलिस ने जबरिया यह मामला बनाया है। जिसकी सच्चाई कुछ और है। उन्होंने अपनी बात साबित करने के लिए ऑडियो-वीडियो पेश किए। ऑडियो के जरिए बताया कि इस पूरी रिकॉर्डिंग में बैंक मैनेजर श्रीवास एक बार फिर लोन की राशि जमा करने की बात कर रहे हैं। वे शिकायतकर्ता को समझाइश दे रहे हैं कि पैसा चुका दोगे तो तुम्हारी ही सिबिल सुधर जाएगी। इसके बाद वह प्यून यादव को बुलाते हैं और शिकायकर्ता का लोन खाते का नंबर बोलकर उसमें उक्त राशि जमा कराने भेज देते हैं। ऑडियो में प्यून-मैनेजर की बातचीत भी रिकॉर्ड हो गई थी। वकीलों ने इसके बाद बैंक परिसर के भीतर के वीडियो फुटेज पर तर्क दिए। उन्होंने बताया कि सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा है कि प्यून यादव, मैनेजर के आदेशानुसार, शिकायतकर्ता के लोन खाते में राशि जमा करने के लिए पर्ची में कुछ लिख रहा है। जबकि इस महत्वपूर्ण सुबूत को अभियोजन ने कोर्ट में पेश नहीं किया। वीडियो में एक और महत्वपूर्ण सीन है। जिसमें ट्रेप टीम के लोग परिसर में कोई दस्तावेज खोज रहे हैं। यह दस्तावेज(फाइल)मयंक की बहन के नाम से खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग द्वारा मंजूर किए लोन के थे। जिनके नाम पर मयंक ने रिश्वत मांगने की शिकायत की थी। बहरहाल लोकायुक्त पुलिस को एक डस्टबिन में यह फाइल मिल जाती है। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि इस फुटेज को रिवर्स करेंगे तो दिखाई देगा कि एक युवक, जो मूलत: शिकायकर्ता मयंक जैन का दोस्त है। वह डस्टबिन के पास धीरे से एक फाइल डाल रहा है। साफ है कि बैंक में खादी और ग्रामोद्योग से कोई फाइल पहुंची तक नहीं थी और उसके नाम पर युवक जैन, मैनेजर पर रिश्वत मांगने का आरोप लगा रहा था।
निर्दोष की जिंदगी से खेलने वाली कार्रवाई
न्यायाधीश मिश्रा ने इस मामले में दोनों आरोपियों मैनेजर जितेंद्र श्रीवास, प्यून निखिल यादव को बरी कर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि, लोकायुक्त पुलिस की यह कार्रवाई निर्दोषों की जिंदगी और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से खिलवाड़ वाली है। उन्होंने कहा कि, ऑडियो में कहीं पर भी यह साबित नहीं हो रहा कि इसमें रिश्वत का कोई लेन-देन हो रहा है। विवेचना में बैंक परिसर में लगे कैमरे के फुटेज भी पेश नहीं किए गए। जिससे साफ साबित हो रहा है कि एक अन्य युवक भी इस कार्रवाई में शामिल है। जिसका उल्लेख अभियोजन ने कहीं पर भी नहीं किया। फुटेज में प्यून जमा पर्ची पर कुछ लिखते हुए दिख रहा है। साफ है कि वह लोन की राशि की किस्त का ब्योरा लिख रहा था। अभियोजन ने इस पर्ची को भी जब्ती रिकॉर्ड पर नहीं लिया। साफ है कि इससे आरोपी पक्ष को लाभ मिलता। इसके अलावा, दोनों आरोपियों को लोकायुक्त पुलिस न्यायालय में पेश करने के बाद सीधे जेल नहीं ले जाकर लोकायुक्त कार्यालय ले गई। जो सही नहीं है। आखिर में न्यायाधीश मिश्रा ने शिकायकर्ता और विवेचनाधिकारी दोनों के खिलाफ न्यायालय मेंं गलत तथ्य पेश करने और निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ झूठा मामला तैयार करने पर कार्रवाई की बात कही है।
26/03/2024



