चौपाल/चौराहा
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गौर निवास में “विद सोडा” पार्टी की फोटुएं दिल्ली तक पहुंची !

नारदवाणी। वे सबसे सीनियर थे इसलिए विवि के टेम्पेररी मुखिया मुकर्रर हो गए। लेकिन अब उनकी चाहत परमानेंट मुखिया बनने की हो गई। जिसे पूरा करने के लिए वे गढ़वाली टोपी पहन आंतरे- दूसरे सागर, भोपाल, दिल्ली के नेताओं के दरबार में कोर्निश बजा ( बादशाह-जहांपनाह वगैरह को सलाम करने का तरीका) रहे हैं। मालूम हुआ है कि उन्हें इस मुहिम में खास लाभ नहीं मिला। जिसकी फ्रस्टेशन उन्होंने पिछले दिनों विवि के संस्थापक के निज निवास यानी गौर भवन में रात्रिकालीन पार्टी कर निकाली। सुना है कि इस पार्टी में जिला-शहर के रसूखदार अफसरों को भी बुलाया गया था। उनकी सेवा खातिर के लिए कांच के गिलास और गुजराती नमकीन से लेकर जम जम और अनिल नेपाली तक के आइटम्स और किन्ले ब्रांड का सोडा वाटर भी सजाया गया था। लेकिन यह क्या ? पार्टी के दौरान किसी ” दिलजले ” ने उनकी व मेहमानों की मोबाइल से फोटुकें निकाल ली। जो वाट्स एप पर सवार होकर दिल्ली तक पहुंच गई। यहां से अब दूसरा सीन। मुखिया बनने की चाहत रखने वाले इन पंप मालिक ने इस पार्टी के चंद रोज बाद विवि के सममें बड़े अफसर से गौर भवन को परमानेंट अलॉट करने की मांग की। तब अफसर ने जवाब दिया कि, गुरु बेकार में परेशान मत हो। आपकी उस “पार्टी” की तस्वीर दिल्ली तक पहुंच गईं। वे पूछ रहे थे कि पार्टी का आयोजक क्या विवि के परमानेंट मुखिया हैं। मैंने जवाब दिया कि नहीं। फिर उन्होंने मुझ से पूछा कि फिर यह आदमी, मुखिया के आधिकारिक निवास में लोगों का जमावड़ा किस अधिकार से किए है ? वो तो मैंने जैसे-तैसे जवाब देकर मसला टाल दिया। गुरु….. आप समझ जाओ। आपको भवन में पर्मानेंट तो दूर की बात है चंद घंटे भी रुकने की अहर्ता नहीं है। इसलिए फिर कभी गौर भवन का जिक्र मत करिएगा। अफसर का ये जवाब सुन टेम्पररी मुखिया अपनी गढ़वाली टोपी को घुमाते हुए अपने ऑफिस के वाशरूम की तरफ चले गए।

पद्म की हसरत पालने वाली ‘स्वयंभू महारानी’ का बंगला बना छावनी !

खुद को ‘महारानी एलिजाबेथ’ समझने वाली एक शख्सियत जिनकी हसरत पर उनके ही अर्दली के बेटे ने पानी फेर दिया और राष्ट्रीय सम्मान पद्म श्री पा लिया। आज कल वे अपने ही घर में किसी जंग की तैयारी करती सी दिख रहीं हैं। इसमें उनकी नॉन रेसीडेंट इंडियन रही बिटिया, जो भारतीय भगोड़ा प्लेबॉय विजय माल्या से करीबी का सार्वजनिक इजहार करती हैं, की प्रमुख भूमिका है। जिसमें उनकी मदद भगवा विचारधारा का दम भरने वाली वे नेत्री कर रहीं हैं, जिन्होंने अपनी सियासी वफादारियों को ताक पर रखकर, अपने एक करीबी कांग्रेसी सुरक्षा एजेंसी संचालक के जरिए इस बंगले को ‘निजी छावनी’ में तब्दील करवा दिया। सिविल लाइन स्थित यह बंगला, जहां कभी एक मक्खी तक को न मारने की नीयत नहीं रही है वहां आजकल हर कोने में सशस्त्र गार्ड्स का पहरा है। ड्रोन दृष्टि से देखने पर यह रिहायशी घर नहीं, बल्कि किसी गढ़ी या हवेली जैसा मंजर पेश करता है। यह क्या ठाठ दिखाने का नया तरीका है या पद्म सम्मान न मिलने की फ्रस्टेशन! यह तो छद्मश्री बन कर रह गईं महारानी या उनके करीबी बता सकते हैं। बहरहाल सूत्रों के अनुसार पद्मश्री न मिलने के सदमे का नतीजा है कि परिवार की एक बुजुर्ग महिला को पैरालिटिक अटैक (लकवा) के बाद बीएमसी के पास एक निजी नर्सिंग होम में दाखिल कराना पड़ा। बताते चलें कि ‘महारानी’ की पैरवी में सागर से नागपुर और दिल्ली तक का जोर लगाया गया था। बीड़ी के धुएं के बीच पद्म अवार्ड के हसीन ख्वाब बुने गए थे। अपनी ही बिरादरी की जिस नेत्री ने इस नामजदगी को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाया था। लेकिन उनके अरमान भी खाक में मिल गए। एक अर्दली के बेटे के जमीनी पुरुषार्थ ने इन तमाम सिफारिशी खतों और रसूखदार लामबंदी को मिट्टी में मिला दिया। बहरहाल अगली 26 जनवरी को घोषित होने वाले पद्म अवार्ड के आनलाइन रजिस्ट्रेशन भी आरंभ हो चुके हैं। हो सकता है फौजफाटा दिखा कर इस बार फिर जोर आजमाइश की जाए।

सीएम को देवरी आने से कौन रोक रहा है ?

यह तीसरा मौका है जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव देवरी विधानसभा क्षेत्र में आते- आते नहीं आए। जनवरी में वे यहां आकर लाड़ली बहना योजना की राशि खातों में ट्रांसफर करने वाले थे तो फरवरी में वे कार्यकर्ता सम्मेलन में आ रहे थे। मार्च आया तो वे यहां टाईगर रिजर्व पार्क में चीता शिफ्टिंग के लिए बन रहे बोमा ( बाड़ा) का भूमिपूजन करने वाले थे। तीसरी बार का कारण बताया गया कि सीएम एलपीजी संकट के कारण नहीं आए। जबकि अगले दिन डॉ. यादव, भोपाल के बाहर एक कार्यक्रम में पहुंचे। कुल मिलाकर प्रश्न ये है कि वे कौन सी ताकतें हैं जो सीएम डॉ. यादव को देवरी आने से रोक रही हैं। उन्हें ऐसा कौन सा भय सता रहा है कि अगर मुख्यमंत्री देवरी आए तो फलां-फलां गणित गड़बड़ा जाएगा। यहां बताना लाजिमी है कि देवरी विधायक बृज बिहारी पटैरिया, हाशिए पर कर दिए गए वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री भूपेंद्रसिंह के करीबी हैं। बात सिंह की निकली है तो सीएम डॉ. यादव, उनके यहां आयोजित 7 दिवसीय धार्मिक आयोजन में भी पूर्व से तय कार्यक्रम के बाद भी नहीं आए थे। लेकिन बाद में वे निर्गुट वरिष्ठतम विधायक व पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव के रहस मेला और चार रोज पहले ही केबिनेट मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के सुपुत्र के प्राइवेट विवि के उद्घाटन समारोह में बाकायदा शामिल हुए।

आबकारी की तरह कानून व्यवस्था पट्टे पर !

बढ़ते अपराधों और बिगड़ती कानून व्यवस्था पर जब कामन मेन और गृहणियां तक सवाल उठाने लगें तो समझिए कि स्थिति चिंतनीय है। लगभग प्रतिदिन हत्या और कटरबाजी सागर शहर के लिए नया फिनोमिना है। पर जिम्मेदार अफसरों को जिम, क्रिकेट, पार्टियों से ही फुर्सत नहीं। गृहविभाग, जब स्वयं प्रांत प्रमुख के पास हो तो जिलों में भेजे गए अफसरानों में ब्रिटिश और मुगलिया सल्तनतों जैसी फीलिंग आ जाती है। जबकि होना यह चाहिए था कि एक एक वारदात को पुलिस के साथ सूबे के मुखिया के इकबाल पर चुनौती मान कर अफसर से लेकर सिपाही तक को डट जाना चाहिए। पर इमेज यह बन रही है जैसे जिला, नगर, थाने सब आबकारी की तरह पट्टे पर उठे हों !


फुटबॉल का फाइनल मैच बना ” फुटबॉल”

शहर और ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष की अगुवाई में जनवरी- फरवरी 2026 में सदर के कजलीवन मैदान में एक सालाना फुटबॉल टूर्नामेंट हुआ। नॉक आउट पद्धति से मैच हुए और फाइनल मैच 8 फरवरी को खिलाया जाना तय हुआ। लेकिन फिर जाने क्या हुआ? ये फाइनल आज दिनांक तक नहीं कराया जा सका। शुरु में ब्याह-शादी और मरग मौत के बहाने चलते रहे फिर मैच की चर्चा ही बंद हो गई। सदर क्षेत्र के सूत्रों का कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि आयोजन के लिए धन की कमी आड़े आ रही है।उसके लिए तो धन सम्पन्न कांग्रेसियों ने समय रहते सहयोग कर ही दिया था। चर्चा ये है कि आयोजक खुद ही फाइनल मैच को “फुटबॉल” बनाए हैं। एक राजी होता है तो दूसरा किसी बात पर नाराज हो जाता है! बहरहाल एक नई चर्चा ये भी है कि आयोजक बोल रहे हैं कि अभी बहुत तेज गरमी पड़ रही है इसलिए मैच सही समय पर कराएंगे। इसका मतलब तो ये है कि जाती ठंड के टूर्नामेंट का एंड आती बरसात में होगा ?

जबलपुर में बीबी और कार्यालय मंत्री की छुट्टी

मुआमला थोड़ा पुराना हो चला है। जिला भाजपा सागर की कार्यकारिणी की लिस्ट की स्याही ढंग से सूखी भी न थी कि एक पदाधिकारी को उसमें से डिलीट कर दिया गया। तात्कालिक कारण बताया गया कि नवनियुक्त कार्यालय मंत्री के सोशल मीडिया पर बगावती तेवर पार्टी- संगठन की मर्यादा के खिलाफ हैं। इसी मसले से जुड़ी एक जानकारी ये सामने आई है कि कार्यालय मंत्री के खिलाफ कतिपय पार्टी पदाधिकारियों ने ये तर्क दिया कि वे सागर में रहते ही नहीं हैं। उनकी पत्नी जबलपुर में हैं इसलिए वे सप्ताह में दो- एक दिन ही भाजपा कार्यालय आते हैं। यहां तक भी ठीक है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कार्यालय मंत्री का प्रभार पाने वाले ये शख्स तो बीते कई साल से इसी पद पर थे। तब किसी पार्टी जन ने यह बात नहीं उठाई। यहां तक कि कार्यकारिणी घोषित होने से पहले इस तथ्य पर क्यों मंथन नहीं किया ? अगर ये सच था तो उन्हें ये जिम्मेदारी ही नहीं देना थी। ऐसे में सवाल ये उठता है कि पहले क्या यह सबकुछ ट्यून्ड था और अब नहीं रहा ! इसलिए छुट्टी को लेकर इस तरह के तर्क दिए जा रहे हैं।

नारदवाणी डेस्क
16/03/2026

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