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नारदवाणी: नंबर- 2 का सागर मोह… ट्रांसफर ‘ड्यू’ है, पर ‘श्रद्धानिधि’ चालू है !

  नारदवाणी

1. नंबर- 2 का सागर मोह… ट्रांसफर ‘ड्यू’ है, पर ‘श्रद्धानिधि’ चालू है !

करीब हफ्ता भर पहले खाकी महकमे में मंझोले स्तर के पुलिस अफसरों के तबादलों की लिस्ट क्या आई, शहर में ‘कौन गया और कौन अड़ा है’ का खेल शुरू हो गया। एक साहब तो बोरिया-बिस्तर समेटकर रफ्तार से रवाना हो गए, लेकिन इन “दूसरे” वाले हुजूर का जाने क्यों सागर से मोहभंग ही नहीं हो रहा। महकमे में इनसे कोई “एग्जिट प्लान” पूछे, तो मासूमियत से फरमाते हैं—”अरे भाई, कप्तान साहब का हुक्म है कि जब तक अगला रिलीवर चार्ज लेने न आ जाए, तब तक क्रीज पर डटे रहो।” वैसे इन “दूसरे” साहब की किस्मत के भी क्या कहने! हाल ही में महकमे का एक ‘बड़ा पुरस्कार’ इनके सीने पर टांगा गया है। मजे की बात ये है कि यह तमगा उन्हें सागर से पहली वाली पदस्थापना के “कारनामों” के लिए नवाजा गया है। अब खाकी के गलियारों में दबी जुबान से चर्चा है कि अगर पुलिस हेडक्वार्टर अवार्ड वाले साल से अगले दो-तीन साल के कामकाज का ‘परफॉर्मेंस ऑडिट’ करा ले, तो शायद पिछले दो और मेडल भी वापस जमा कराने की नौबत आ जाए! खैर, अपन को क्या? सुना है कि इन साहब के जाने का सबसे ज्यादा ‘गम और मातम’ शहर के “बेगम-बादशाह” और “चीकू-संतरा” के खेल संचालक खेमे में है। रोते भी क्यों न? इन साहब ने कई इलाकों में इन सिंडिकेट्स के दिलों से लोकल टीआई का भय और प्रीत दोनों को ही ‘सिस्टमैटिकली’ खत्म कर दिया था। शायद यही वजह है कि वे नई पोस्टिंग पर जाने से बचने के लिए समय के एक-एक मिनट और घंटे का ‘मैक्सिमम यूटिलाइजेशन’ कर रहे हैं। आखिर ‘फ्रीलांसिंग’ के इस एक्स्ट्रा टाइम में भी संचालकों की ओर से “श्रद्धानिधि” का फ्लो पहले की तरह ही अनवरत जारी जो है !

2. ‘पॉजिटिव न्यूज’: कांग्रेस की गुटबाजी अब ‘फाइव स्टार’ हो गई है !

लीजिए साहब, एक ‘ब्रेकिंग न्यूज’ सुनिए! हमारे जिले की “दो” कांग्रेसों में से जो देहाती (ग्रामीण) वाली कांग्रेस है, उसके अध्यक्ष जी अभी भी “भोपाल चलो… दिल्ली ले चलेंगे” वाले मोड से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। वे जिले से इतने ‘आउट ऑफ स्टेशन’ रहते हैं कि पिछले दिनों जब शाहपुर के दोहरे हत्याकांड के बाद प्रदेशाध्यक्ष दौरा करने पहुंचे, तो लोकल कांग्रेसी बिफर गए। उन्होंने अध्यक्ष जी को पीड़ित परिवार से मिलने तक नहीं दिया। सीधा ‘ बोले कि “इतने दिन कहां गायब थे हुजूर? अब जब फोटो सेशन का वक्त आया, तो चेहरा दिखाने आ गए?”
खैर, देहात को छोड़िए, शहरी कांग्रेस से एक “पॉजिटिव और प्रोग्रेसिव” खबर है। अमूमन शहरी कांग्रेस हमेशा ‘तीन पहियों’ गाड़ी टाइप माने रिक्शा बनी रही है। अतीत का इतिहास गवाह है—पहले चौधरी-कटारे-सबलोक रहे, फिर पचौरी-तोमर-कटारे का दौर आया। आजकल “जाटव ईरा” चल रहा है। जिसमें ‘बड़ा अपग्रेड’ यह हुआ है कि यह गुट अब थ्री-सीटर से बढ़कर ‘5 सीटर’ हो गया है। इस नए ‘फाइव-स्टार’ गुट में जाटव, दुबे, पुरोहित, जैन और पचौरी (भारी-भरकम बदन वाले) शामिल हैं। लेकिन अफसोसनाक और चिंताजनक बात यह है कि कुनबा “बड़ा” होने के बाद भी पार्टी की ‘चरचराहटा’ तनिक भी नहीं बढ़ा है। माने पहले ढाक के तीन पात थे, अब पांच हो गए हैं !

3. ‘प्रॉक्सी’ प्रथम नागरिक: दफ्तर से तौबा और ‘कांग्रेसी’ वर्किंग की दरकार

यहाँ ‘प्रथम नागरिक’ शब्द सुनकर भ्रम में मत पड़िएगा। गुजारिश है कि यहाँ ‘प्रथम नागरिक’ का मतलब उनके ‘माननीय प्रतिनिधि’ से ही समझा जाए, क्योंकि प्रतिनिधि जी के रसूखदार चेहरे की बदौलत ही तो नागरिक को “प्रथम” होने का गौरव हासिल हुआ है। अब आते हैं ‘अंदर की बात’ पर। चौथा साल खत्म होते-होते प्रतिनिधि जी का नगर निगम से ‘रोमांस’ पूरी तरह खत्म होता दिख रहा है। अब वे ननि के दफ्तर में उतनी ही ‘लो फ्रीक्वेंसी’ के साथ जाते हैं, जितनी फ्रीक्वेंसी पर कोई साधारण नागरिक अपने संपत्ति कर, जल कर के अचानक बढ़ने पर तकादा करने जाता है। गलियारों में कानाफूसी है कि प्रथम नागरिक की निगम के ‘सबसे बड़े अफसर’ से पटरी बिल्कुल भी नहीं बैठ रही। यह ‘ईगो क्लैश’ तब से और ज्यादा बढ़ गया है, जब से साहब अपनी बदली को ऊपर से ‘कैंसिल’ करवाकर वापस लौटे हैं। इधर, प्रतिनिधि जी का ‘बेड लक’ देखिए कि शहर के भाजपाई जलसों और कार्यक्रमों में भी उन्हें ‘ना के बराबर’ तवज्जो मिल रही है। ऐसे में नारद मुनि की मुफ्त की ‘एडवाइस’ यह है कि अगर प्रथम नागरिक को शहर में अपनी सियासी वजूद और राजनीति जिंदा रखनी है, तो उन्हें अपनी पुरानी वाली “कांग्रेसी वर्किंग स्टाइल” को फौरन री-बूट करना होगा। वही पुरानी स्टाइल, जिसमें वे बिना किसी भय, द्वेष या अनुराग के, सीधे मंच पर या सामने की पहली पंक्ति में अपनी जगह ‘बाय हुक या बाय क्रुक’ बना ही लेते थे।

4. नज़ूल है फिज़ूल… मोटो है—’बस पैसा हो वसूल!’

अंग्रेज़ों के जमाने से शुरू हुआ ‘नज़ूल’ का यह काला कानून, आज सागर में ‘साहब बहादुरों’ की अवैध वसूली का सबसे बड़ा और जीता-जागता ‘बिजनेस मॉडल’ बन चुका है। मध्य प्रदेश के अन्य महानगरों (जैसे भोपाल या इंदौर) में नज़ूल की जमीन पर बनी आलीशान कॉलोनियों में रहने वाले रईस इसे अपनी पुश्तैनी ज़ागीर और मलकियत मानते हैं, लेकिन हमारे सागर की महिमा ही न्यारी है! यहाँ के बाबू और अफ़सर सीधे जनता के मुंह पर कह देते हैं—”मियां, ये ज़मीन तुम्हारी है ही नहीं, बोरिया-बिस्तर तैयार रखो, कभी भी खाली करना पड़ सकता है।”
बेघर होने के खौफ से डरे-सहमे आम लोग इन अफ़सर-बाबुओं की ‘जी-हुज़ूरी’ और खिदमत करने पर मजबूर हैं। वैसे, इस विभाग के एक ‘पुराने साहब बहादुर’ ने तो इस पूरे महकमे पर अघोषित ताला लगाकर चाबी को ‘कोल्ड स्टोरेज’ में पटक दिया था, जो तब से वहीं धूल खा रही है। नतीजतन, शहर में न तो कोई ‘नवीनीकरण’ हो रहा है और न ही ‘नामांतरण’ ! बस केवल ‘अधिग्रहण’ का भूत दिखाकर बैकडोर से मोटी वसूली का खेल चल रहा है। पूरे सूबे में ‘फ्री-होल्ड’ की रियायती नीति लागू है, पर न जाने “किस” चमत्कारी कारण से सागर इस नियम का अपवाद बना हुआ है। ‘अंदरूनी सूत्रों’ से पुख्ता खबर है कि कुछ सफेदपोश नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों के कॉकटेल (गुट) ने नज़ूल के पेचीदा नियमों का नाजायज फायदा उठाकर, सिविल लाइंस की बेशकीमती जमीनों को कौड़ियों के दाम (माटी-मोल) हड़पने का पूरा ‘नेक्सस और षड्यंत्र’ तैयार कर लिया है। अंग्रेजों की तरह वे भी इस प्राइम लैंड को खुद “कालोनाइज़“ करना चाहते हैं, और यहाँ के पुराने बाशिंदों को देश की वित्त मंत्री ‘सीतारमण अम्मा’ का वह मशहूर मीम-डायलॉग सुनाने की तैयारी में हैं—”अरे भाई, तू क्या लेकर आया था, और क्या लेकर जाएगा!”

5. शहजादे की हिमाकत Vs अफसर की जमावट

किस्सा जून 2022 का है। जब हमारे शहर की एक स्वयंभू महारानी यानी ‘बीड़ी क्वीन’ (लोकल एलिज़ाबेथ) की तीसरी पीढ़ी के एक अकडू, ‘शहज़ादे’ ने ‘कर्मचारी कल्याण’ के एक केंद्रीय विभाग के बड़े अफ़सर को आर्थिक अपराध प्रकोष्ट से ट्रैप करा डाला था। मामला चूंकि बेहद ‘हाई-प्रोफाइल’ था, तो शुरुआती दिनों में मीडिया ने भी खूब टीआरपी बटोरी, हेडलाइंस चमकाईं और फिर हमेशा की तरह ‘शॉर्ट-टर्म मेमोरी लॉस’ का शिकार होकर भूल गई। खैर, मामला कछुए की रफ्तार से घिसटते-घिसटते आखिरकार इंसाफ के मंदिर तक पहुँच ही गया। मंदिर के ‘पुजारी’ ने शुरू-शुरू में तो बड़ी मुस्तैदी दिखाई और पूजा की तमाम कानूनी फॉर्मेलिटीज फटाफट निपटा लीं। लेकिन, इसके बाद पिक्चर में एंट्री हुई सन्नी देवल के एवरग्रीन डायलॉग की—”तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़!”
अब जबकि ‘ पूजा’ अपने बिल्कुल अंतिम चरणों में है, न जाने क्यों पूर्णाहुति के लिए शुभ मुहूर्त नहीं बन पा रहा है ! वैसे तो कानूनी इतिहास यही कहता है कि अक्सर छोटे-मोटे चूहे तो जाल में फंसकर निपट जाते हैं, लेकिन मगरमच्छ हमेशा बेदाग बच निकलते हैं। यही वजह है कि इस समय शहर में अफवाहों का ‘बाजार और तापमान’ दोनों ही 40-42 डिग्री के पार चल रहे हैं। फुसफुसाहट है कि आरोपी अफ़सर ने दिल्ली-भोपाल के उच्च स्तरीय विद्वानों, विदुषियों, गणमान्य सफेदपोशों और रसूखदार की खूब पूछ-परख की है। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि जीत शहजादे की चार साल पुरानी हिमाकत की होगी या अफसर की जमावट की।
9425172417… सागरवाणी

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