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विवि में शिक्षक के निधन का मातम और नए साल का जश्न एक साथ !

चंद दिन पहले जयंती और पुण्य तिथि भी एक ही मंच पर मना डाली थी

सागर।  डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में इन दिनों परंपराओं और संवेदनाओं का एक ऐसा घालमेल देखने को मिल रहा है, जो ‘विद्वत्ता’ की परिभाषा पर ही सवालिया निशान खड़ा कर रहा है। जिस परिसर को देश-समाज को दिशा दिखानी चाहिए थी, वहां के कर्ता-धर्ता खुद संवेदनशीलता से भटकते नजर आ रहे हैं। ताज़ा मामला एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर के निधन पर आयोजित शोकसभा और नववर्ष के जश्न को एक साथ ‘क्लब’ करने का है, जिसने विश्वविद्यालय की साख को शहर के चौक-चौराहों पर चर्चा का विषय बना दिया है।
शोक और हर्षों-उल्लास का ‘फ्यूजन’
वाकया पहली जनवरी का है। विश्वविद्यालय के गौर समाधि प्रांगण में नववर्ष मिलन समारोह का आयोजन किया गया था। प्रभारी कुलपति प्रो. यशवंत सिंह राजपूत की मौजूदगी में विवि के तमाम  शिक्षक और अधिकारी नए साल की खुशियां बांटने जमा हुए थे। लेकिन इसी बीच एक अजीबोगरीब निर्णय लिया गया। एमबीए विभाग के रिटायर्ड प्रोफेसर एम.के. सैनी, जिनका तीन दिन पहले निधन हो गया था, उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इसी जश्न के मंच का चुनाव कर लिया गया। मानो प्रशासन के पास समय का इतना अभाव था कि एक दिवंगत साथी की गरिमा के लिए अलग से 15 मिनट निकालना भी भारी पड़ रहा था। तय हुआ कि ये ‘काम’ पहले निपटा लिया जाए। नतीजतन पहले दो मिनट का मौन, और फिर वहीँ से मौज-मस्ती का दौर शुरु।
‘ओम शांति’ के तुरंत बाद पकौड़ा पार्टी और फरमाइशें
संवेदनाओं का तमाशा यहीं नहीं रुका। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही प्रो. सैनी की आत्मा की शांति के लिए मौन खत्म हुआ, मौजूद बौद्धिक भीड़ के सुर बदल गए। जिस स्थान पर शांति थी, वहां चंद मिनटों में हंसी-ठहाके गूंजने लगे। दो मिनट पहले सिर झुकाए खड़े शिक्षक एक-दूसरे को नए साल की बधाइयां देने लगे। और उसके बाद ‘भजिया पार्टी’ का दौर शुरु हो गया। हद तो तब हो गई जब शोकसभा स्थल पर संगीत की महफिल जम गई। मास्साब लोग एक-दूसरे से गानों की फरमाइशें करने लगे। इस रंगारंग कार्यक्रम ने उस गमगीन माहौल को पूरी तरह निगल लिया जो प्रो. सैनी के सम्मान में रखा जाना चाहिए था। बहरहाल शहर में लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह वही शिक्षक लॉबी है जो समाज को नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाती है ? क्या यह ‘संवेदना’ या औपचारिकता का भद्दा प्रदर्शन नहीं है?
परंपरा बन चुकी है यह ‘मिश्रित संस्कृति’
हैरानी की बात यह है कि विवि प्रशासन के लिए यह कोई पहली चूक नहीं है। हाल ही में 25 दिसंबर को भी ऐसा ही नजारा दिखा था, जब ‘रंगनाथन सभागार’ में विवि के संस्थापक डॉ. हरीसिंह गौर की पुण्यतिथि और महामना मदन मोहन मालवीय की जयंती को एक ही मंच पर “गौर-मालवीय पुण्य-उदय दिवस” के रूप में मना लिया गया। डॉ. गौर, जिन्होंने अपनी सारी पूंजी शिक्षा के लिए दान कर दी, उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा और महामना की जयंती का उल्लास एक ही समय पर आयोजित करना आयोजकों के दिवालियापन को दर्शाता है। क्या आयोजकों को इतना भी बोध नहीं है कि पुण्यतिथि पर दी जाने वाली श्रद्धांजलि और जयंती पर मनाया जाने वाला उत्सव, दोनों की प्रकृति और भावनाएं अलग-अलग होती हैं? वरिष्ठ शिक्षकों की असहजता के बावजूद प्रभारी कुलपति प्रो. ठाकुर और कुलसचिव एसपी उपाध्याय की मौजूदगी में इस ‘कृत्रिम श्रद्धा’ का प्रदर्शन जारी रहा।
सवालों के घेरे में विवि के ‘विद्वतजन’
सवाल यह उठता है कि जिस विश्वविद्यालय ने कानून और समाजशास्त्र के बड़े नाम दिए, वहां के वर्तमान नीति-निर्धारकों का ‘ज्ञान’ इतना संकुचित कैसे हो गया? क्या विवि प्रशासन के पास अलग-अलग आयोजनों के लिए संसाधन या समय की कमी है? क्या एक दिवंगत शिक्षक का सम्मान इतना सस्ता है कि उसे भजिया पार्टी और गानों के बीच फिट कर दिया जाए? क्या महापुरुषों और पूर्व साथियों के प्रति यह सम्मान केवल ‘कैलेंडर’ की तारीखें निपटाने की एक मजबूरी बन गया है? विश्वविद्यालय परिसर के भीतर उपजा यह ‘शोक-उल्लास’ का हाइब्रिड मॉडल न केवल परंपराओं का अपमान है, बल्कि यह उन हजारों छात्रों के लिए भी गलत नजीर पेश कर रहा है जो अपने गुरुओं के आचरण से जीवन का सलीका सीखते हैं। अगर यही संवेदनशीलता है, तो फिर असंवेदनशीलता किसे कहेंगे? 
02/01/2026

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