चादांमऊ अग्निकांड: पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल या ‘NGO’ का अति-उत्साह? न्याय के नाम पर साक्ष्यों से खिलवाड़!

सागर। नरयावली थाना क्षेत्र के चंदामाऊ ग्राम में हुई हृदयविदारक आगजनी की घटना, जिसमें दो मासूमों की जान चली गई और एक बेटी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही है, अब एक नए विवाद के केंद्र में आ गई है। यह विवाद जितना पुलिस की ढुलमुल जांच को लेकर है, उससे कहीं अधिक एक गैर-सरकारी संगठन की घटनास्थल पर ‘समानांतर जांच’ और उसके बाद दिए गए विवादास्पद बयानों को लेकर खड़ा हो गया है। हाल ही में ‘मानव अधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग’ के पदाधिकारियों ने चंदामाऊ पहुंचकर घटनास्थल का मुआयना किया। इस दौरान टीम में संगठन के प्रदेश प्रभारी सुनील दुबे, जिलाध्यक्ष बृजेश श्रीवास्तव, महिला विंग की जिलाध्यक्ष एडवोकेट अर्चना तिवारी, महासचिव इन्दू वैद्य और जिला मीडिया प्रभारी आशीष तिवारी शामिल थे। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस संवेदनशील स्थान पर दो मौतें हुई हों और साक्ष्य सुरक्षित रखे जाने चाहिए थे, वहां यह NGO न केवल चहल-कदमी करता रहा, बल्कि तकनीकी विशेषज्ञों की तरह यह निष्कर्ष भी निकाल लिया कि आग ‘दुर्घटना’ नहीं बल्कि ‘साजिश’ थी।
पुलिस की ‘भ्रमित’ कार्यप्रणाली और ‘आयोग’ शब्द का मायाजाल
सबसे बड़ा सवाल स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठता है। ऐसा प्रतीत होता है कि नरयावली थाना प्रभारी कपिल लक्षकार और जरूवाखेड़ा चौकी प्रभारी अनिल कुजूर इस संगठन के नाम में जुड़े ‘मानव अधिकार’ और ‘आयोग’ जैसे शब्दों से भ्रमित हो गए। पुलिस ने न केवल इस निजी संगठन को घटना स्थल पर बेधड़क घूमने दिया, बल्कि केस से जुड़ी हर गोपनीय जानकारी और आरोपी फहीम खान की कस्टडी को लेकर भी इनके सामने ‘समर्पण’ कर दिया। पुलिस की इसी ‘आव-भगत’ का नतीजा रहा कि संगठन के पदाधिकारियों ने मीडिया में आकर पुलिस पर ही लीपापोती के गंभीर आरोप लगा दिए।
क्या साक्ष्यों के साथ हुआ खिलवाड़?
अग्निकांड के मामले में साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। NGO के एक सदस्य का दावा है कि जिस स्कूटी के ब्लास्ट होने की बात पुलिस कह रही है, उसके पास की दीवार काली तक नहीं हुई, जिससे सिद्ध होता है कि आग बाहर से लगाई गई। यदि एक निजी संगठन के सदस्य को यह तथ्य नजर आ रहा था, तो क्या पुलिस ने इस महत्वपूर्ण साक्ष्य को आमजन से सुरक्षित रखने के बजाय उसे प्रदर्शन की वस्तु बना दिया? संवेदनशील घटनास्थल पर बाहरी लोगों की ऐसी ‘जांच’ केस की भविष्य की कानूनी कार्रवाई और साक्ष्यों की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
लॉ एंड ऑर्डर के लिए बन सकता है खतरा
इस मामले में पुलिस जहां इसे प्रथम दृष्टया दुर्घटना बता रही है, वहीं एनजीओ ने इसे सीधे तौर पर ‘योजनाबद्ध आगजनी’ करार देते हुए एक पक्षीय बयानबाजी शुरू की है। मरणासन्न युवती के बयानों का हवाला देकर जिस तरह से संदेही व्यक्ति (फहीम खान) की भूमिका और उसको लेकर पुलिस की कार्यवाही पर सवाल उठाए गए हैं, वह क्षेत्र में सांप्रदायिक या सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है। जानकारों का कहना है कि किसी भी निजी संस्था को यह अधिकार नहीं है कि वह पुलिस की जांच के समानांतर अपनी ‘अदालत’ लगाए और जनता के बीच भ्रम पैदा करे।
थाना प्रभारी लक्षकार ने मानी चूक
इस गंभीर विषय पर जब ‘सागरवाणी’ ने नरयावली थाना प्रभारी कपिल लक्षकार से चर्चा की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि स्थिति असहज हुई है। उन्होंने माना कि मौके पर इस संगठन को इस तरह के तीखे और जांच को प्रभावित करने वाले बयान नहीं देने चाहिए थे। थाना प्रभारी ने स्पष्ट किया कि वे इस पूरे घटनाक्रम और संगठन की दखलंदाजी के संबंध में पुलिस अधीक्षक (SP) को विधिवत प्रतिवेदन सौंपेंगे।
आज धर्म जागरण संगठन का प्रतिनिधि मंडल जाएगा
इधर घटना स्थल पर एक एनजीओ की मौजूदगी व पुलिस की भूमिका को लेकर मप्र बाल संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य ओमकार सिंह का कहना है कि यह मामला दो नाबालिग बच्चों की अप्राकृतिक मौत से जुड़ा है। पुलिस को इस संबंध में पर्याप्त संवेदनशीलता व साक्ष्यों के प्रति सावधानी रखना चाहिए। सिंह ने बताया कि शुक्रवार को वे स्वयं धर्म जागरण संगठन के सदस्यों के साथ चांदामऊ गांव जाएंगे।
25/12/2025



