सागर की शराब ठेकेदार फर्म रेड ब्रिज ट्रेडर्स पाक्षिक फीस भरने में नाकाम, ठेका निरस्त करने का मिला नोटिस
भोपाल के रसूखदार और लोकल सिंडिकेट को मिलाकर बनी है फर्म


सागर। जिले के सहायक आयुक्त आबकारी कार्यालय ने ‘रेड ब्रिज ट्रेडर्स एलएलपी’ को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। यह नोटिस ग्रुप द्वारा दिसंबर माह के प्रथम पक्ष की ‘न्यूनतम प्रत्याभूत ड्यूटी’ (MGQ) जमा न करने के चलते जारी हुआ है। विभाग ने ठेकेदार पर करीब 2 लाख रुपये (2,01,533 रु.) की पेनाल्टी भी ठोकी है। नोटिस में 3 दिन के भीतर बकाया राशि जमा करने का अल्टीमेटम दिया है, अन्यथा लाइसेंस निरस्त करने की चेतावनी दी गई है।
532 करोड़ का दांव और पार्टनरशिप के भीतर का खेल
रेड ब्रिज ग्रुप ने सागर जिले के एकल समूह के लिए करीब 532 करोड़ रुपये की भारी-भरकम बोली लगाकर यह ठेका अपने नाम किया था। इस ग्रुप में बड़े, मंझले, संझले और स्थानीय माइक्रो लेविल के कारोबारी भी शामिल हैं। ग्रुप में भोपाल की एक नामचीन शराब कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी है। 
आबकारी की नाकामी और बाहरी शराब का ‘अटैक’
इस पूरे संकट की जड़ में आबकारी विभाग की वह नाकामी है, जिसके चलते बाहरी जिलों से आने वाली शराब की अवैध खेपों पर लगाम नहीं लग पा रही है। जिले की सीमाओं से रिसकर आ रही बाहरी शराब के कारण स्थानीय दुकानों की बिक्री पर सीधा असर पड़ा है। विभाग अवैध परिवहन रोकने में पूरी तरह सुस्त है।चर्चा है कि आबकारी के बड़े अफसर “ट्रक लेविल” पर इस खेल में शामिल हैं। जिसका खामियाजा घूम-फिरकर ठेकेदार को ही उठाना पड़ रहा है।
पार्टनर्स के बीच खींचतान और ओवर रेट की मार
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, रेड ब्रिज ग्रुप की राहतगढ़, रहली, शाहगढ़ और सुरखी जैसी 14 कंपोजिट दुकानों पर 2 करोड़ रु. (2,01,53,280 रुपये) से अधिक की लाइसेंस फीस बकाया है। जानकारों का कहना है कि पार्टनर्स के बीच आपसी मुनाफे की खींचतान, नंबर दो की शराब का बढ़ता चलन और लाइसेंस फीस की भरपाई के नाम पर ग्राहकों से वसूला जा रहा ‘ओवर रेट’ इस ग्रुप की कहीं न कहीं वित्तीय कमर तोड़ रहा है। सूत्र बताते हैं ठेके में बिग ब्रदर की भूमिका शामिल भोपाली पार्टनर, अपनी ही डिस्टिलरी की शराब खपाने पर जोर दे रहे हैं, जिसे नंबर एक के साथ-साथ ‘नंबर दो’ (अवैध तरीके) से भी बिकवाने का यह दबाव भी पार्टनर्स को घाटे का सौदा साबित हो रहा है। खैर… समय पर पाक्षिक जमा नहीं कर पाने की स्थिति पहले भी बन चुकी है। जिसका निपटारा कभी सराफा बाजार तो कभी रीयल इस्टेट कारोबारियों से मदद मांग कर किया गया।
23/12/2025



