“पापा जीवित लेकिन कोमा में हैं” सात साल पुराने चर्चित विवाद के जवाब में बोले प्रो. मिश्र
7 साल पहले ''शव या जीवित पिता" पर खूब हुआ था विवाद

सागर। 7 साल पहले मध्य प्रदेश के तत्कालीन एडीजी राजेंद्र कुमार मिश्र के पिता के जीवित और मृत होने को लेकर जमकर विवाद हुआ था। इस विवाद में मप्र हाईकोर्ट से लेकर मानव अधिकार आयोग तक शामिल हो गए थे। इस पुराने और बहुचर्चित घटनाक्रम लेकर ” सागरवाणी” ने तत्कालीन एडीजी राजेंद्र कुमार मिश्र के छोटे भाई एवं डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के लाइब्रेरी एंड इन्फॉर्मेशन साइंस विभाग के प्रो.जेके मिश्र से चर्चा की। मंगलवार को उनका सेवानिवृत्ति समारोह था। प्रो. मिश्रा ने जवाब दिया कि हमारे पिता कुलामणि मिश्रा आज भी जीवित हैं, लेकिन कोमा में हैं। पिताजी वर्तमान में गृह राज्य उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में बड़े भाई रिटा.एडीजी राजेंद्रकुमार मिश्र की देख-रेख हैं।
प्रो. मिश्र ने दृढ़ता से कहा, ” पिताजी के शरीर के कई अंग सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, ऐसे में हम उन्हें मृत कैसे मान लें? वे हमारे जन्मदाता हैं और जब तक हमसे संभव होगा, हमारा पूरा परिवार उनकी सेवा-सुश्रुषा करता रहेगा।” उनकी आयु 90 वर्ष से अधिक हो गई है।
क्या था 2019 का पूरा घटनाक्रम और रहस्य ?
यह पूरा मामला जनवरी-फरवरी 2019 का है, जब भोपाल के हाई-प्रोफाइल ’74-बंगले’ इलाके में रहने वाले तत्कालीन एडीजी राजेंद्र कुमार मिश्रा के पिता कुलामणि मिश्रा (84 वर्ष) को बंसल अस्पताल के डॉक्टरों ने 14 जनवरी को मृत घोषित करते हुए डेथ सर्टिफकेट तक जारी कर दिया था। लेकिन मिश्र परिवार का दावा था कि घर लाने पर पिता की नब्ज और पल्स ऑक्सीमीटर चालू मिले तथा पचमढ़ी से आए पारिवारिक नाड़ी वैद्य ने भी उनके जीवित होने की पुष्टि की। इसके बाद एडीजी ने पिता के शव का अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया और उन्हें घर में ही रखा। जब पड़ोसियों ने शिकायत की तब यह अजीबो-गरीब मामला मीडिया में आया। प्रशासन में हड़कंप मच गया और मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने मुख्य सचिव व डीजीपी को नोटिस जारी कर सच्चाई सामने लाने कहा। लेकिन तत्कालीन एडीजी मिश्र ने डॉक्टरों की जांच टीम को अपने घर में घुसने नहीं दिया। वे इसे अपना निजी मामला बताते रहे। जिसके बाद यह कानूनी जद्दोजहद हाई कोर्ट तक भी पहुंची थी। सात सालों के लंबे अंतराल के बाद प्रोफेसर जेके मिश्र के इस ताजा बयान ने साबित कर दिया है कि परिवार आज भी अपने उसी पुराने अटूट विश्वास पर कायम है। चिकित्सा विज्ञान के नियमों और पारिवारिक आस्था के बीच की यह असाधारण जंग आज भी बदस्तूर जारी है, जिससे विज्ञान, कानून और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक अभूतपूर्व बहस खड़ी हो सकती है।
सागरवाणी….9425172417………30/06/2026



