नारदवाणी:”कन्यादान योजना” में भार्गव का दांव और कार्यकारिणी में श्याम का मास्टर स्ट्रोक !


1.कन्यादान योजना और ‘भार्गव’ का ‘भारी दांव’
नारदवाणी। बुंदेलखंड की राजनीति के शिखर पुरुष गोपाल भार्गव ने एक चिट्ठी क्या जारी की, मानों क्षेत्र के बाकी रसूखदारों के माथों पर गुड़ी पड़ने लगी। हुआ ये कि सरकारी ‘मुख्यमंत्री कन्यादान योजना’ के नए नियमों ने जब शादियों की संख्या पर ‘कैप’ (सीमा) लगाई, तो भार्गव ने बड़ी सफ़ाई से उसके समानांतर अपनी ‘गोपाल जी पुण्य विवाह योजना’ का झंडा गाड़ दिया है। यह महज एक योजना नहीं, बल्कि उन मंत्रियों, पूर्व मंत्रियों और माननीय विधायकों को खुल्ला चैलेंज है, जो अब तक सरकारी बजट के भरोसे अपनी राजनीति चमकाते आए थे। भार्गव ने ऐलान कर दिया है कि अब न कागज चाहिए, न आय प्रमाण पत्र। बस बेटी रहली की हो, तो नकद और उपहार सीधे घर पहुंचेंगे। असल सवाल यह है कि क्या ज़िले के बाकी ‘माननीयों’ में इतना ‘मैदानी और आर्थिक साहस’ है कि वे अपनी जेब ढीली कर ऐसा कुछ कर पाएं ?
2. जिलाध्यक्ष का ये ‘जातीय’ मास्टर स्ट्रोक
नारदवाणी।सियासत में दोस्ती और पड़ोसदारी से ऊपर एक चीज़ होती है ‘अपनापन’, और वो आता है एक ही बिरादरी से होने पर। जिलाध्यक्ष जी ने जब अपने पड़ोस में रहने वाले एक युवा को महामंत्री बनाया, तो शहर के सियासी गलियारों में कानाफूसी हुई कि किसी तजुर्बेकार को मौका क्यों नहीं मिला? पर असली ‘दांव’ तो अब खुला है। दरअसल, ये युवा नेता प्रदेश के ‘मुखिया’ की जात के हैं। अब जब मुखिया जिले के दौरे पर आते हैं, तो महामंत्री की उनसे करीबी देखते ही बनती है। जिलाध्यक्ष ने एक तीर से दो शिकार किए हैं।महामंत्री को बगल में बैठाया और मुखिया का हाथ अपने सिर पर धरवा लिया। साल भर बाद नगरीय निकाय चुनाव हैं, और ऐसे में ‘ऊपर’ तक की ये सीधी सेटिंग बड़े काम आएगी।
3 ईसी की बिसात पर सियासी कुलपति की चालें
नारदवाणी। कहते हैं राजनीति के ‘पुराने चावल’ जब खिचड़ी पकाते हैं, तो खुशबू दूर तक जाती है। रानी अवंती बाई विवि के कुलपति विनोद मिश्रा जी ने शिक्षा के मंदिर में ऐसी ‘नेतई’ दिखाई है कि बड़े-बड़े धुरंधर बगलें झांक रहे हैं। राज्यपाल महोदय ने कार्य परिषद क्या चुनी, मानो कुलपति महोदय की ‘विश-लिस्ट’ पूरी हो गई। स्थानीय दिग्गजों को धता बताकर उन्होंने ऐसे मोहरे सेट किए हैं कि विवि की करोड़ों की खरीदी और नियुक्तियों में किसी ‘बाहरी’ का दखल न रहे। जबलपुर के पुराने सियासी खिलाड़ी मिश्रा जी जानते हैं कि ‘न्योरे-न्योरे’ (झुककर) चोरी कैसे की जाती है। अब जब ईसी में अपने ही बंदे हों, तो फिर विवि का दरबार हो या भंडार, सब पर हुकूमत अपनी ही होगी।
4. सरहदों की गूँज या महज़ रियाज़?
नारदवाणी। सागर के आसमान में जब फाइटर प्लेन गरजे, तो शहर के ‘बतोलेबाजों’ ने उसे सीधे ईरान-इजराइल युद्ध से जोड़ दिया। जैसे एयरफोर्स की सारी रणनीति सागर की चौपाटी पर ही तय होनी हो! मगर साहब, ये कोई जंग की तैयारी नहीं, बल्कि जयपुर से दमोह के रनेह तक का ‘हवाई रियाज़’ था। जो कल तक ग्वालियर से आगरा-मथुरा की हवाएं नापते थे, वे अब बुंदेलखंड की माटी देख रहे हैं। जयपुर के बड़े अफ़सर रनेह में डेरा डाले रहे और हमारे शहर के लोग बादलों में ‘तीसरी विश्व युद्ध’ की लकीरें ढूंढते रह गए। 
5. यूपी वाले अखिलेश भैया ने ताजपोशी की फिर भी दाऊ की बेरुखी !
नारदवाणी। अखिलेश भैया ने पद तो नवाज़ दिया, पर गौरी सिंह यादव जी की रूह अभी भी आराम फरमा रही है। एमपी के प्रभारी तो बन गए, पर मजाल है कि एक बार भी भोपाल के दफ्तर में कदम रखा हो। इसी साल 15 जनवरी की नियुक्ति के बाद से ‘दाऊ’ ऐसे गायब हैं जैसे ईद का चाँद। उनके करीबी इसे ‘नाराज़गी’ का जामा पहना रहे हैं, पर अंदरूनी खबर ये है कि दाऊ को अपनी साख का डर सता रहा है। उन्हें लगता है कि वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष की ‘मंडली’ उन्हें वह तवज्जो नहीं देगी जिसके वे हकदार हैं। अब वे लखनऊ वाले बड़े नेताओं (अक्षयकुमार सिंह व देवेश कुमार ) के लश्कर के साथ ही अपनी एंट्री मारना चाहते हैं, ताकि रसूख में कोई कमी न रह जाए।
9425172417…….30/03/2026



