

– फोन- पे, गूगल- पे से भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के भी आरोप !
– एक बंदी की मां ने कलेक्टर सागर से की है लिखित शिकायत
सागर। सागर की केंद्रीय जेल विवादों के घेरे में है। उसकी चारदीवारी के पीछे से निकलकर आ रही भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की खबरों ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कतिपय बंदी जेल प्रशासन से सांठ-गांठ कर फोन- पे, गूगल- पे के जरिए अवैध वसूली करवा रहे हैं। हाल ही में सामने आए एक मामले में एक बंदी की मां ने कलेक्टर से गुहार लगाते हुए जेल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इस महिला का कहना है कि जेल स्टाफ मेरे बेटे को जर्दा खाने के आरोप में झूठा फंसाने की धमकी दे रहा है। दिल्ली से आई इस महिला का कहना है कि, मुझे अपने बेटे से भी नहीं मिलने दिया जा रहा। इधर इस महिला के आरोपों की कुछ हद तक केंद्रीय जेल प्रबंधन ने पुष्टि कर दी है। एक दिन पहले जेल डीजी को, जेल अधीक्षक द्वारा एक मीडिया रिपोर्ट के संदर्भ में भेजी गई शिकायत में उन्होंने परोक्ष रूप से स्वीकारा है कि जेल के भीतर जर्दा- गुटखा वगैरह पहुंच रहा है। जिसके चलते उन्होंने इस महिला के बेटे पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की है। लेकिन अब सवाल ये है कि जेल के भीतर प्रतिबंधित सामग्री पहुंचने के मामले में उन्होंने संबंधित स्टाफ पर क्या कार्रवाई की ? उन्होंने इस बारे में डीजी जेल को अवगत क्यों नहीं कराया? बहरहाल यह पहली बार नहीं है जब सागर जेल से इस तरह की अराजकता की खबरें बाहर आई हों।
जेल की सलाखों से बाहर निकले बंदी और हवालाती नाम उजागर न करने की शर्त पर वहां जारी अवैध वसूली के खेल का कच्चा चिट्ठा अक्सर मीडिया के सामने खोलते रहे हैं। पूर्व बंदियों के अनुसार, जेल परिसर में नशीले पदार्थों जैसे तंबाकू, गुटखा और बीड़ी पर प्रतिबंध केवल कागजों तक ही सीमित है। हकीकत यह है कि जेल के भीतर ये सामग्रियां 50 से 100 गुना अधिक कीमतों पर धड़ल्ले से उपलब्ध कराई जाती हैं। एक हवालाती ने बताया कि हाथ से बना जर्दा गुटखा पुड़िया के साइज के हिसाब से 500 से 1000 रुपये तक में बेचा जाता है। यही हाल बीड़ी और सिगरेट का भी है, जो बाहर की तुलना में आसमानी कीमतों पर कैदियों तक पहुंचाई जाती हैं। वसूली का यह जाल केवल नशे तक ही सीमित नहीं है। जेल के भीतर ‘सुविधाओं’ की भी अपनी एक रेट लिस्ट है। जिन बंदियों के परिवारों की आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक है, उनसे ठीक भोजन और सोने के लिए पर्याप्त बिछौना उपलब्ध कराने के बदले मोटी रकम वसूली जाती है। सबसे ज्यादा रकम जिला एवं मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में शिफ्ट करने के नाम पर वसूली जाती है। जेल से बाहर आए लोगों का दावा है कि इस पूरे सिंडिकेट को जेल का ‘गोल इंचार्ज’ और उसके साथी संचालित करते हैं। इस वसूली के लिए शहर में फैले अपने गुर्गों का सहारा लिया जाता है ताकि पैसों का लेन-देन जेल परिसर से बाहर सुरक्षित तरीके से हो सके।
हैरानी की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में जेल स्टाफ का सीधा दखल भले ही न दिखे, लेकिन जिस संगठित तरीके से इस वसूली की रूपरेखा तैयार की जाती है, उसे देखते हुए जेल प्रशासन की संलिप्तता या मौन सहमति से इनकार नहीं किया जा सकता। अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहे इस ‘काले साम्राज्य’ ने सुधार गृह कही जाने वाली जेल को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया है। इधर इन सभी आरोपों को लेकर सागरवाणी ने केंद्रीय जेल सागर के अधीक्षक मानवेंद्रसिंह परिहार से उनका पक्ष जानना चाहा। लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। उन्हें वाट्स एप पर उपरोक्त बंदी की मां का शिकायती आवेदन व अन्य आरोपों की फेहरिस्त शेयर की गई। जिसका जवाब भी उन्होंने नहीं दिया।



