तब यूपी सरकार ने बर्खास्त कर दिए थे प्रदेश के सभी 27 हजार पटवारी
सागर में 12 पटवारी निलंबित, 137 को नोटिस, पटवारियों के स्वामित्व योजना के विरोध के चलते हड़ताल से राजस्व संबंधी कामकाज ठप

सागर। स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों के रहवासों की रजिस्ट्री में बतौर भूमि-स्वामी अपना नाम दर्ज कराने के विरोध में पटवारियों का राज्य स्तरीय प्रदर्शन जारी है। इधर समीक्षा बैठकों और मैदानी निरीक्षण के दौरान पाई गई अनियमितताओं पर सख्त रुख अपनाते हुए कलेक्टर प्रतिभा पाल ने जिले के 12 पटवारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है, जबकि 137 अन्य पटवारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इसके अलावा कलेक्टर ने अधीक्षक भू-अभिलेख से वर्ष 2023-24 में पदस्थ हुए 60 से अधिक प्रोवशनरी पटवारियों की सूची भी मांगी है, जिससे इन नए कर्मचारियों पर भी कार्रवाई का संकट गहरा गया है। बता दें कि राज्य सरकार मालवा के उज्जैन, शाजापुर, रतलाम, मंदसौर, आगर-मालवा, देवास और नीमच में 27 से ज्यादा प्रोवेशनरी पटवारियों को बर्खास्त किया जा चुका है।
मध्य प्रदेश में आर-पार की लड़ाई और शासन का अल्टीमेटम
सरकार की दंडात्मक कार्रवाई के विरोध में मध्य प्रदेश पटवारी संघ ने 7 अक्टूबर से ही सभी शासकीय व्हाट्सएप ग्रुप छोड़ दिए हैं और ऑनलाइन राजस्व पोर्टल का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया है। इसके साथ ही प्रदेश के लगभग 24,000 पटवारी 8 से 11 अक्टूबर तक चार दिन के सामूहिक अवकाश पर चले गए हैं। संघ के प्रांताध्यक्ष उपेंद्र सिंह बघेल ने चेतावनी दी है कि यदि देवास और अन्य जिलों में हुई बर्खास्तगी तथा निलंबन की कार्रवाई तुरंत वापस नहीं ली गई, तो पूरे प्रदेश में बिना पूर्व सूचना के पूर्ण काम बंद कर अनिश्चितकालीन हड़ताल की जाएगी। इस गतिरोध को सुलझाने के लिए पटवारी संघ के प्रतिनिधिमंडल को वल्लभ भवन में डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल के साथ वार्ता के लिए बुलाया गया है। दूसरी ओर, सामान्य प्रशासन विभाग ने ‘नो वर्क नो पे’ का नियम लागू करते हुए 24 घंटे के भीतर काम पर न लौटने पर सेवा में व्यवधान (ब्रेक इन सर्विस) की चेतावनी दी है, जिससे पटवारियों की वरिष्ठता और पेंशन पर सीधा असर पड़ सकता है।जिन पटवारियों पर निलंबन की कार्रवाई की गई है, उनमें मीना खैरवार ग्राम मोठी, तहसील सागर ग्रामीण), लक्ष्मी जाटव ग्राम भौंहारी, , अखिलेश दीक्षित बमनोदा गढ़ाकोटा, राजकुमार गौड़ और भूपेन्द्र राज (दोनों परिवीक्षाधीन पटवारी, तहसील केसली), अजय श्रीवास्वत विनायठा, तहसील खुरई, गोविन्द राय खिमलासा, तहसील खुरई, पुष्पेन्द्र भदौरिया तहसील मालथौन , महेन्द्र अर्गल तहसील मालथौन, योगेन्द्र प्रताप परिवीक्षाधीन, तहसील बांदरी, दिलीप राजा बंडा अभिषेक कोरी बंडा, सिंगरावन तथा ब्रजेंद्र रावत जूना, तहसील रहली शामिल हैं।
जाति- निवास प्रमाणपत्र व नामांतरण की फाइलें अटकीं
राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हितग्राही मूलक योजनाओं का सीधा सरोकार आम जनता और किसानों के दैनिक जीवन से जुड़ा है। पटवारियों के सामूहिक अवकाश और ऑनलाइन पोर्टल के बहिष्कार के कारण मैदानी स्तर पर राजस्व संबंधी समस्त सेवाएं पूरी तरह से ठप पड़ गई हैं। वर्तमान में विद्यार्थियों और युवाओं को शैक्षणिक प्रवेश तथा सरकारी नौकरियों के आवेदनों के लिए आय, जाति और मूल निवास प्रमाण पत्रों की अत्यधिक आवश्यकता है, लेकिन पटवारियों की अनुपस्थिति के कारण इन प्रमाण पत्रों के सत्यापन का काम पूरी तरह रुक गया है। इसके साथ ही किसानों को अपनी जमीनों के नामांतरण, बंटवारे, सीमांकन और गिरदावरी जैसे अति-आवश्यक कार्यों के लिए तहसीलों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। भूमि क्रय-विक्रय के बाद होने वाले दाखिला-खारिज और नामांतरण की फाइलें अलमारियों में बंद पड़ी हैं। फसलों के नुकसान या कृषि ऋण (KCC) से जुड़े सत्यापन न होने के कारण किसान शासकीय योजनाओं के आर्थिक लाभ से वंचित हो रहे हैं। समय पर इन कार्यों का निष्पादन न होने से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोग परेशान हैं।
जब यूपी सरकार ने प्रदेश के सभी 27 हजार पटवारी बर्खास्त कर दिए थे
मध्य प्रदेश में पटवारियों पर हुई इस कड़ी कार्रवाई के बीच उत्तर प्रदेश का 70 साल पुराना ऐतिहासिक घटनाक्रम प्रासंगिक हो जाता है। वर्ष 1952-53 में उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. सम्पूर्णानंद और राजस्व मंत्री चौधरी चरण सिंह के कार्यकाल में ऐसा ही बड़ा प्रशासनिक संकट खड़ा हुआ था। उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 जुलाई 1952 को जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम लागू किया था, जिसका उद्देश्य जमींदारी प्रथा को खत्म कर जमीन का सीधा मालिकाना हक किसानों को देना था। इस नए कानून और बढ़े हुए काम का पटवारियों ने पुरजोर विरोध किया। सरकार पर दबाव बनाने के लिए उत्तर प्रदेश पटवारी संघ के आह्वान पर करीब 27,000 पटवारियों ने एक साथ सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया। पटवारियों का मानना था कि इतने बड़े पैमाने पर इस्तीफे होने से राजस्व व्यवस्था ठप हो जाएगी और सरकार झुकने पर मजबूर होगी। लेकिन, राजस्व मंत्री चौधरी चरण सिंह ने अभूतपूर्व कड़ा रुख अपनाते हुए सभी 27,000 पटवारियों के इस्तीफे तुरंत स्वीकार कर लिए और उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। इसके बाद मार्च 1953 में ‘लेखपाल’ नाम से एक नए पद का गठन किया गया और पारदर्शी तरीके से नई भर्तियां की गईं, जिसमें समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया गया। अनुशासनहीनता दिखाने वाले पुराने पटवारियों की नौकरी हमेशा के लिए चली गई। जो अच्छा काम करते थे उन्हें पुनः सेवा ले लिया गया। इसके बाद से उत्तर प्रदेश से ‘पटवारी’ शब्द का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
08/10/2026….9425172417



